देवगढ़ के घने जंगल में छिपा है एक ऐसा दरवाजा, जिसके पार बसती है खौफनाक दूसरी दुनिया। वहाँ कैद हैं वर्षों से लापता इंसान, और अँधेरे में जाग चुका है लाल आँखों वाला खूंखार राक्षस कालकासुर। अपनी बकरी धवली को खोजते हुए श्यामू एक ऐसे भयानक रहस्य में फँस जाता है, जहाँ मौत भी उसका पीछा नहीं छोड़ती।
गाँव के घने जंगल में दूसरी दुनिया का दरवाजा – Horror Story In Hindi
बहुत साल पहले घने जंगल और ऊँची पहाड़ियों से घिरे देवगढ़ गाँव में एक ऐसा रहस्य छिपा था, जिसके बारे में लोग खुलकर बात करने से भी डरते थे।
जैसे ही अँधेरा होता, गाँव के बुजुर्ग अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते और बच्चों को बाहर नहीं जाने देते। गाँव में हर तरफ डर फैला था।
वजह यह थी कि जंगल की कुछ रहस्यमयी जगहों से लोग गायब हो चुके थे, जिनका कभी पता तक नहीं चलता था। कोई नहीं जानता था कि वे कहाँ गए।
कुछ लोगों का कहना था कि पहाड़ी की गुफा में कोई शापित चीज़ है, जिसके कारण यह सब हो रहा है। पिछले पाँच सालों में कई लोग जंगल से लौटे नहीं थे।
उन लोगों का आज तक कुछ पता नहीं चला था। पूर्णिमा की रात को लोग घरों से निकलना पसंद नहीं करते थे। इसी देवगढ़ इलाके में श्यामू नाम का एक गरीब लड़का रहता था।
लोग उसकी इज्जत करने के बजाय उसका मजाक उड़ाते रहते थे। श्यामू बकरीवाला था और उसकी टूटी-फूटी झोपड़ी गाँव के एक किनारे पर थी। उसके पास न खेत थे, न पैसा।
उसकी सारी धन-दौलत उसकी बकरियाँ थीं। श्यामू का दिल बहुत बड़ा था। अगर कोई बूढ़ा या अन्य व्यक्ति बीमार पड़ता, तो वह उसे बिना पैसे लिए दूध देता था।
गाँव वाले उसकी अच्छाई का फायदा उठाते थे। कई लोग दूध लेने के बाद धन्यवाद तक नहीं करते थे, लेकिन श्यामू कभी शिकायत नहीं करता था।
वह हमेशा मुस्कुराता रहता था। उसकी सबसे प्यारी बकरी का नाम धवली था। वह पूरी तरह सफेद थी और श्यामू उसे अपने परिवार का हिस्सा मानता था।
तूफान वाली शाम और दूसरी दुनिया का दरवाजा
एक दिन आसमान में काले बादल छा गए और पूरे जंगल में सन्नाटा फैल गया। पक्षियों की आवाजें भी बंद हो चुकी थीं। श्यामू अपनी बकरियाँ चराकर लौट रहा था।
तभी उसे धवली कहीं दिखाई नहीं दी। उसने हर तरफ देखा, लेकिन उसकी प्यारी बकरी नजर नहीं आई। फिर उसे दूर पहाड़ी की ओर से मिमियाने की आवाज सुनाई दी।
श्यामू तुरंत उस दिशा में दौड़ा। जितना वह आगे बढ़ता गया, जंगल उतना ही डरावना होता गया। पेड़ों की परछाइयाँ किसी राक्षस की तरह फैलती जा रही थीं।
अचानक उसे लगा कि कोई उसकी निगरानी कर रहा है। उसने पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। फिर भी उसे अँधेरे में किसी की मौजूदगी महसूस हो रही थी।
कुछ देर बाद श्यामू पहाड़ी के नीचे पहुँच गया। उसके सामने एक विशाल गुफा थी। यही वह जगह थी, जिसके बारे में सोचकर भी गाँव के लोग डरते थे।
कहा जाता था कि जो भी इस गुफा में गया, वह कभी वापस नहीं आ सका। श्यामू को बहुत डर लग रहा था, परंतु वह धवली को खोजने अंदर चला गया।
गुफा के अंदर बर्फ जैसी ठंड थी। दीवारों पर अजीब निशान बने हुए थे, जैसे किसी ने गुप्त भाषा में कुछ लिखा हो। अचानक उसे दूर दो लाल आँखें चमकती दिखाई दीं।
श्यामू का गला सूख गया, लेकिन अगले ही पल वे आँखें गायब हो गईं। तभी पूरी गुफा में एक भयानक आवाज गूँजी, “वापस चले जाओ!”
श्यामू डर गया, लेकिन धवली को छोड़कर इस तरह जाना उसे संभव नहीं लगा। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। अचानक उसे अपनी बकरी धवली दिखाई दी।
वह एक विशाल चट्टान के सामने खड़ी काँप रही थी। जमीन हिलने लगी और सामने की चट्टान धीरे-धीरे हटने लगी। उसके पीछे जो दिखाई दिया, उसे देखकर श्यामू काँप उठा।
वहाँ पत्थर का एक विशाल दरवाजा खड़ा था। दरवाजे पर चाँद जैसे कुछ निशान बने हुए थे। अचानक दरवाजे से नीली रोशनी निकलने लगी और गुफा की हवा तेजी से घूमने लगी।
श्यामू वहाँ से भागना चाहता था, लेकिन एक अदृश्य शक्ति उसे अपनी तरफ खींच रही थी। अगले ही पल वह और धवली उस दरवाजे के भीतर समा गए।
दूसरी दुनिया, गोपाल और एक भयानक सच
जब श्यामू की आँख खुली, तो वह एक अजीब-सी दुनिया में पड़ा था। आसमान बैंगनी रंग का था और हवा में सुनहरे कण तैर रहे थे।
श्यामू घबराकर उठ बैठा। तभी पीछे से किसी की आवाज आई, “तुम बच गए, यह अच्छी बात है।” उसने मुड़कर देखा, तो वहाँ उसकी उम्र का एक लड़का खड़ा था।
उसकी आँखों में हल्की नीली चमक थी। वह बोला, “मैं गोपाल हूँ और तुम अभी अपनी दुनिया में नहीं हो।” श्यामू ने आसपास देखा, लेकिन धवली वहाँ दिखाई नहीं दी।
गोपाल श्यामू को अपने साथ एक सुरक्षित जगह पर ले गया। अगले कुछ दिनों में दोनों की दोस्ती गहरी हो गई और श्यामू को गोपाल पर विश्वास होने लगा।
गोपाल ने उसे अपनी दुनिया के बारे में बहुत कुछ बताया। लेकिन श्यामू ने एक अजीब बात पर ध्यान दिया। हर आधी रात को दूर जंगलों में जंजीरों की आवाज आती थी।
कई बार श्यामू को लगता था, जैसे कोई उसे मदद के लिए बुला रहा हो। एक रात वह चुपके से उस दिशा में अकेला चला गया।
अचानक उसे दूर कई लोग दिखाई दिए। वे मोटी लोहे की जंजीरों में बँधे हुए थे। उनमें से एक चेहरा उसे जाना-पहचाना लगा।
वह देवगढ़ के लापता लोगों में से ही एक था। श्यामू की रूह काँप गई। तभी किसी भयानक प्राणी की गर्जना सुनाई दी और पूरा जंगल काँप उठा।
जंजीरों में बँधे लोग डर से काँपने लगे। श्यामू के पसीने छूटने लगे। वह तुरंत भागकर गोपाल के पास गया, लेकिन गोपाल ने उस विषय पर बात करने से मना कर दिया।
धीरे-धीरे एक महीना बीत गया और पूर्णिमा की रात आ गई। गोपाल श्यामू को उसी रहस्यमयी दरवाजे तक ले गया। दरवाजा फिर से नीली रोशनी से चमकने लगा।
श्यामू अपने घर लौटने वाला था। जाने से पहले गोपाल ने उसे सोने की एक मोहर दी और कहा, “श्यामू, इसे संभालकर रखना।”
गोपाल ने यह भी कहा, “याद रखना, अगली पूर्णिमा को मैं तुमसे मिलने जरूर आऊँगा।” तभी दूर पहाड़ों की दिशा से ऐसी गर्जना सुनाई दी कि धरती काँप उठी।
आसमान में घने काले बादल छा गए। गोपाल का चेहरा डर से पीला पड़ गया। पहली बार श्यामू ने उसकी आँखों में डर देखा।
उसी क्षण अँधेरे में दो विशाल आँखें चमकीं। वे सीधे श्यामू को घूर रही थीं। गोपाल घबराकर चिल्लाया, “भागो, श्यामू! उसे तुम्हारे बारे में पता चल गया!”
इससे पहले कि श्यामू कुछ समझ पाता, गोपाल ने उसे दरवाजे की तरफ जोर से धक्का दे दिया। नीली रोशनी चमकी और श्यामू अपनी दुनिया में लौट आया।
उसका शरीर टूट-सा रहा था। उस रात उसे नींद नहीं आई, क्योंकि जाते-जाते उसने उन लाल आँखों को आखिरी बार देखा था। उसे लगा, कोई भयानक प्राणी मुस्कुरा रहा है।
सोने की मोहर, कुसुम और कैदियों का रहस्य
दूसरी दुनिया से लौटने के बाद भी श्यामू कई दिनों तक सामान्य नहीं हो पाया। उसकी आँखों के सामने नीला दरवाजा, बैंगनी आसमान और गोपाल का चेहरा घूमता रहता था।
कई बार उसे लगता कि यह सब सपना था, लेकिन जेब में रखी सोने की मोहर देखकर उसे यकीन हो जाता कि यह सब सच है।
अगले दिन वह देवगढ़ के सुनार के पास पहुँचा। सुनार ने मोहर हाथ में ली, तो उसके चेहरे का रंग बदल गया। उसने उसे कई बार उलट-पलटकर देखा।
सुनार ने धीमी आवाज में पूछा, “श्यामू, यह तुम्हें कहाँ से मिली?” श्यामू गोपाल का रहस्य नहीं बताना चाहता था, इसलिए उसने झूठ बोला कि उसे यह जंगल में मिली है।
सुनार कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “बेटा, मैंने अपनी पूरी जिंदगी में ऐसी मोहर नहीं देखी। यह सैकड़ों साल पुरानी लग रही है, लेकिन इस पर समय का कोई निशान नहीं है।”
यह सुनकर श्यामू के रोंगटे खड़े हो गए। मोहर बेचने के बाद उसे इतने पैसे मिले कि उसने अपनी झोपड़ी की मरम्मत करवाई और दो नई बकरियाँ भी खरीद लीं।
लेकिन यही बात गाँव वालों की आँखों में चुभने लगी। ठाकुर भैरव सिंह ने चौपाल में कहा, “एक गरीब चरवाहा अचानक पैसे वाला कैसे बन गया? जरूर कोई राज छिपा है!”
उसके बेटे रघु ने कहा, “बापू, मैंने इसे कई बार जंगल की ओर जाते देखा है। मुझे लगता है कि यह कोई खजाना ढूँढ़ लाया है।”
उसी दिन से रघु और उसके दो साथी श्यामू पर नजर रखने लगे। उधर श्यामू की रातें भी अजीब होने लगीं। सोते समय उसे बार-बार वही गुफा दिखाई देती थी।
सपने में गुफा से किसी की दर्दनाक आवाज आती, “हमें बचाओ!” फिर अचानक अँधेरे में दो लाल आँखें चमकने लगतीं। श्यामू डरकर जाग जाता और सोचता कि यह सपना था या सच।
इसी तरह एक महीना बीत गया। फिर पूर्णिमा की रात आ गई। पूरा जंगल चाँदनी में डूबा था। श्यामू चुपचाप अपनी झोपड़ी से निकला और गुफा की ओर चल पड़ा।
गुफा के अंदर जाते ही उसे वही नीली रोशनी दिखाई दी। पत्थर का दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा और अगले ही पल गोपाल मुस्कुराता हुआ बाहर आया।
श्यामू उसे देखकर खुश हो गया। दोनों मित्र काफी देर तक बातें करते रहे, लेकिन आज गोपाल कुछ बेचैन लग रहा था। उसकी निगाहें बार-बार अँधेरे की तरफ जा रही थीं।
तभी अचानक गुफा से पायल की आवाज आने लगी। श्यामू चौंककर इधर-उधर देखने लगा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। फिर अचानक उसके सामने एक सुंदर लड़की आ गई।
उसकी उम्र लगभग श्यामू जितनी थी। उसके लंबे बाल थे और आँखों में हल्की चमक थी। वह मुस्कुराकर बोली, “तो तुम ही हो श्यामू बकरीवाले?”
श्यामू कुछ बोल पाता, उससे पहले ही वह लड़की गायब हो गई। अगले ही पल वह कुछ दूर फिर दिखाई दी और बोली, “डरो मत। मैं कुसुम हूँ। मुझे लोगों को डराना बहुत पसंद है।”
धीरे-धीरे तीनों की बातचीत शुरू हो गई। कुसुम ने श्यामू से देवगढ़ के बारे में बहुत कुछ पूछा। लेकिन जब श्यामू ने उसकी शक्ति के बारे में पूछा, तो वह शांत हो गई।
उसने कहा, “हर शक्ति की एक कीमत होती है। और कभी-कभी वह कीमत बहुत बड़ी होती है।” उसके चेहरे के भाव देखकर लगा कि वह कुछ छिपा रही है।
तभी गोपाल ने बात बदल दी। इससे श्यामू का शक बढ़ गया। उसे महसूस हुआ कि वे दोनों उससे कोई महत्वपूर्ण बात छिपा रहे हैं।
कुछ देर बाद कुसुम अचानक गायब हो गई। गोपाल ने बताया कि वह एक जरूरी काम से गई है। पूर्णिमा की रात खत्म होने वाली थी।
वास्तव में कुसुम दूसरी दुनिया के उस हिस्से की ओर जा रही थी, जहाँ आम लोगों का जाना मना था। वह देवगढ़ के फँसे हुए लोगों को ढूँढ़ रही थी।
उसने पहले भी गाँव से गायब हुए बहुत से लोगों को बचाया था। अब अदृश्य होकर वह घने जंगल और ऊँची चट्टानों के बीच से गुजरती हुई आगे बढ़ी।
अचानक उसे जंजीरों की आवाज सुनाई दी। वह सावधानी से आगे बढ़ी। सामने का दृश्य देखकर उसकी साँसें रुक गईं। कई लोग लोहे की जंजीरों में जकड़े हुए थे।
उनके चेहरे थके हुए और डरे हुए थे। तभी उसकी नजर एक बूढ़े आदमी पर पड़ी। वह देवगढ़ का रहने वाला था और वर्षों पहले गायब हुआ था।
कुसुम को देखते ही बूढ़े के मन में उम्मीद जाग उठी। वह फुसफुसाया, “क्या तुम मुझे देख सकती हो?” कुसुम चौंकी और धीमे स्वर में बोली, “हाँ।”
बूढ़े की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा, “तो सुनो, उसे मत जगने देना।” कुसुम ने पूछा, “किसे?” लेकिन बूढ़ा कुछ और बोल पाता, उससे पहले धरती काँपने लगी।
दूर से भारी कदमों की आवाज आने लगी। सभी कैदियों के चेहरों पर डर छा गया। बूढ़ा काँपते हुए बोला, “भाग जाओ! अभी भाग जाओ!”
वह उस प्राणी के बारे में जानता था, जिसने अदृश्य कुसुम को भी देख लिया था। कुसुम अदृश्य हो गई, लेकिन भारी कदमों की आवाज लगातार उसकी तरफ बढ़ती रही।
अँधेरे में दो विशाल लाल आँखें चमकीं। अचानक एक भारी आवाज गूँजी, “मैं जानता हूँ कि तुम यहाँ हो, कुसुम!” वह अदृश्य थी, फिर भी प्राणी को उसका पता चल गया था।
लाल आँखें उसी दिशा में घूमीं, जहाँ वह खड़ी थी। कुसुम तेजी से भागी। पीछे से आवाज आई, “भाग जाओ, लेकिन ज्यादा दिन नहीं छिप पाओगी!”
किसी तरह कुसुम गोपाल और श्यामू के पास पहुँची। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था। उसने उन्हें पूरी घटना बताई। पहली बार गोपाल भी डर गया।
कुछ क्षणों तक तीनों के बीच सन्नाटा छाया रहा। तभी दूर पहाड़ों पर गर्जना गूँजी और पूरी दूसरी दुनिया काँप उठी। गोपाल ने धीरे से कहा, “समय कम होता जा रहा है।”
श्यामू ने पूछा, “किस बात का समय?” लेकिन गोपाल ने कोई जवाब नहीं दिया। उसी क्षण दूर अँधेरे में दो लाल आँखें फिर चमकीं और सीधे उनकी ओर देखने लगीं।
लाल आँखों वाले राक्षस का रहस्य और श्यामू का बदलाव
दूसरी दुनिया के पहाड़ों के उस पार अँधेरे में चमकती दो लाल आँखें अब भी श्यामू, गोपाल और कुसुम को घूर रही थीं। हवा अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई थी।
जंगल के विशाल पेड़ अजीब आवाजें निकाल रहे थे। दूर पहाड़ों पर काले बादल मंडरा रहे थे। श्यामू ने काँपते हुए पूछा, “गोपाल, आखिर वह है कौन?”
गोपाल कुछ क्षण चुप रहा। उसके चेहरे पर पहली बार डर साफ दिखाई दे रहा था। फिर उसने कहा, “उसका नाम कालकासुर है।”
यह नाम सुनते ही कुसुम की आँखें झुक गईं। सैकड़ों साल पहले कालकासुर ने पूरी दूसरी दुनिया को अपने कब्जे में ले लिया था।
उसने गाँव जलाए, लोगों को गुलाम बनाया और जो भी उसका विरोध करता था, उसे मौत के घाट उतार देता था। श्यामू ध्यान से सुनता रहा।
गोपाल ने बताया कि सात महान जादूगरों ने मिलकर कालकासुर को हराया और एक जादुई बोतल में कैद कर दिया था। श्यामू ने पूछा, “लेकिन वह बाहर कैसे आया?”
गोपाल ने गहरी साँस ली। उसके सेवक वर्षों से उसकी शक्ति वापस लाने की कोशिश कर रहे थे। उसने कहा, “शायद अब वह पूरी तरह जाग चुका है।”
तभी दूर कहीं से फिर वही गर्जना सुनाई दी। पूरी धरती हिल गई। श्यामू के मन में देवगढ़ के वे लोग घूम गए, जो वर्षों पहले गायब हो गए थे।
अब उसे समझ आ गया था कि वे लोग कहाँ गए थे और शायद किस हाल में जी रहे थे। उसी क्षण उसने मन में निर्णय कर लिया कि वह पीछे नहीं हटेगा।
अगले कई दिनों तक श्यामू दूसरी दुनिया में गोपाल के साथ रहा। हर रात गोपाल उसे जादू की छोटी-छोटी बातें सिखाता और कुसुम उसे खतरे को पहचानना सिखाती।
धीरे-धीरे श्यामू बदलने लगा। जो लड़का कभी गाँव वालों की बातें सुनकर चुप हो जाता था, अब उसकी आँखों में आत्मविश्वास दिखाई देने लगा।
एक रात गोपाल उसे एक प्राचीन मंदिर में ले गया। मंदिर हजारों साल पुराना था और उसकी दीवारों पर अजीब चिह्न बने हुए थे।
मंदिर के बीचोंबीच पत्थर का एक बहुत बड़ा गोलाकार चक्र था। गोपाल ने उस पर हाथ रखा, तभी कुछ शब्द चमकने लगे। श्यामू ने पढ़ा, “जिसे शक्ति नहीं हरा सकती, उसे उसका अहंकार हराता है।”
श्यामू कुछ समझ नहीं पाया, लेकिन गोपाल मुस्कुरा दिया। उसने कहा, “यही कालकासुर की कमजोरी है।” तभी अचानक कुसुम दौड़ती हुई आई। उसके चेहरे पर घबराहट थी।
कुसुम ने कहा, “मैंने कैदियों को फिर देखा है!” गोपाल चौंक गया। उसने आगे बताया, “उनमें देवगढ़ के लोग भी थे।” श्यामू का खून खौल उठा।
श्यामू बोला, “तो फिर देर किस बात की?” उसी रात तीनों कैदियों को छुड़ाने निकल पड़े। कई घंटों की यात्रा के बाद वे एक विशाल घाटी में पहुँचे।
अंतिम लड़ाई, धवली और रहस्यमयी बोतल
घाटी के बीचोंबीच लोहे की जंजीरों से बँधे सैकड़ों लोग बैठे थे। कुछ बूढ़े थे और कुछ जवान। कई लोग इतने कमजोर हो चुके थे कि खड़े भी नहीं हो पा रहे थे।
तभी श्यामू की नजर एक बूढ़े आदमी पर पड़ी। वह देवगढ़ का ही था। बूढ़े ने श्यामू को पहचान लिया और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
वह बोला, “बेटा, हमें यहाँ से निकालो।” श्यामू का दिल भर आया। कुसुम अदृश्य हो गई और उसने पहरेदारों की चाबियाँ चुरा लीं। गोपाल ने जादू से जंजीरों को कमजोर कर दिया।
फिर श्यामू ने पूरी ताकत से जंजीरें तोड़ना शुरू किया। एक-एक करके कैदी मुक्त होने लगे। तभी धरती काँप उठी, आसमान काला हो गया और घाटी में भयानक आवाज गूँजी।
“तो आखिर तुम यहाँ पहुँच ही गए!” सभी लोग डरकर पीछे हट गए। सामने कालकासुर खड़ा था। उसका विशाल शरीर पहाड़ जैसा था और लाल आँखें आग की तरह जल रही थीं।
वह हँसते हुए बोला, “मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।” गोपाल का चेहरा सफेद पड़ गया, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि यह सब एक जाल था।
कालकासुर ने एक ही वार में कई पेड़ गिरा दिए। लोग चीखते हुए भागने लगे। श्यामू ने पहली बार बिना डरे उसका सामना किया, लेकिन उसकी शक्ति कालकासुर के सामने बहुत छोटी थी।
तभी गोपाल चिल्लाया, “तुम्हें योजना याद है?” श्यामू समझ गया। वह जानबूझकर कालकासुर को चिढ़ाने लगा। “इतना बड़ा राक्षस होकर भी तुम डरते हो!”
कालकासुर की आँखों में आग भड़क उठी। वह गरजा, “मूर्ख इंसान!” फिर पूरी ताकत से श्यामू के पीछे दौड़ा। श्यामू उसे उसी प्राचीन मंदिर की ओर ले जाने लगा।
उधर कुसुम पहले ही अदृश्य होकर मंदिर पहुँच चुकी थी। लेकिन अभी तक किसी को पता नहीं था कि वह वहाँ क्या कर रही थी। आखिरकार कालकासुर मंदिर तक पहुँच गया।
वह हँसने लगा और बोला, “बस, यही है तुम्हारी उम्मीद?” तभी मंदिर के चिह्न चमक उठे। जमीन काँपने लगी और पत्थर का विशाल चक्र घूमने लगा।
कालकासुर का चेहरा बदल गया। पहली बार उसके चेहरे पर डर दिखाई दिया। वह चिल्लाया, “नहीं!” उसी समय कुसुम अचानक प्रकट हुई। उसके हाथ में एक छोटी, पुरानी बोतल थी।
वह साधारण बोतल नहीं थी। वही जादुई बोतल थी, जिसमें कभी कालकासुर को कैद किया गया था। कुसुम ने मंदिर के नीचे छिपे प्राचीन यंत्रों को सक्रिय कर दिया था।
पूरा मंदिर एक विशाल जाल बन चुका था। पत्थर की जंजीरें जमीन से निकलीं और उन्होंने कालकासुर को जकड़ लिया। वह पूरी ताकत से छूटने की कोशिश करने लगा।
उसी समय श्यामू को एक परिचित मिमियाने की आवाज सुनाई दी। उसने पलटकर देखा, तो धवली वहाँ आ गई थी। उसकी सफेद देह धूल से भरी थी, लेकिन वह सुरक्षित थी।
श्यामू खुशी से पुकार उठा, “धवली!” वह अपनी प्यारी बकरी के पास जाने ही वाला था कि कालकासुर ने जोरदार झटका दिया। श्यामू ने धवली को अपने पास खींच लिया और उसे सुरक्षित जगह पर पहुँचा दिया।
धवली भी श्यामू के साथ वहीं रुक गई। श्यामू ने उसे पाकर राहत की साँस ली, फिर गोपाल और कुसुम की मदद करने के लिए वापस मुड़ गया।
पहाड़ काँपने लगे और आसमान में बिजली चमकने लगी। गोपाल ने अंतिम मंत्र पढ़ना शुरू किया। नीली रोशनी मंदिर में फैल गई और बोतल अपने आप खुल गई।
उसके अंदर से एक भयंकर नीला भँवर निकला। कालकासुर चीख उठा और चिल्लाने लगा, “नहीं! नहीं!” उसका विशाल शरीर धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगा।
वह भँवर की ओर खिंचने लगा। कालकासुर दहाड़ता रहा और संघर्ष करता रहा, लेकिन इस बार उसकी शक्ति बेकार थी। कुछ ही क्षणों में उसका पूरा शरीर बोतल के भीतर समा गया।
बोतल अपने आप बंद हो गई। उसी समय पूरी दूसरी दुनिया में शांति छा गई। काले बादल गायब हो गए और लाल आँखें हमेशा के लिए बुझ गईं।
कालकासुर के कैद होते ही सभी गुलाम आज़ाद हो गए। देवगढ़ के लापता लोग भी मुक्त हो गए। घाटी में खुशी फैल गई और श्यामू ने धवली को प्यार से सहलाया।
दो दुनियाओं की दोस्ती का रहस्य
कुछ दिन बाद वह समय आ गया, जब श्यामू को अपनी दुनिया में लौटना था। वह उदास था। गोपाल और कुसुम भी चुप थे। धवली उसके पास खड़ी थी।
तभी दूसरी दुनिया के सबसे बुज़ुर्ग जादूगर उनके सामने आए। उन्होंने कहा, “अब कालकासुर का अंत हो चुका है, लेकिन तुम्हारी दोस्ती का अंत नहीं होना चाहिए।”
फिर उन्होंने जादुई दरवाजे की ओर देखा और कहा, “यह दरवाजा अब कभी बुरी शक्तियों के लिए नहीं खुलेगा। लेकिन हर पूर्णिमा की रात कुछ घंटों के लिए खुलेगा।”
श्यामू की आँखों में चमक आ गई। गोपाल मुस्कुराया और कुसुम खुशी से हँस पड़ी। आखिरकार विदाई का समय आया और श्यामू धवली के साथ अपने संसार में लौट आया।
इस बार उसका दिल टूटा नहीं था, क्योंकि वह जानता था कि यह आखिरी मुलाकात नहीं है। समय बीतता गया और देवगढ़ में लोग उसका सम्मान करने लगे।
जो लोग कभी उसे गरीब और बेसहारा समझते थे, वही आज उसकी तारीफ करते थे। फिर भी श्यामू वैसा ही सरल था और धवली उसके साथ रहती थी।
एक महीने बाद पूर्णिमा की रात आई। चाँद पूरा गोल था। श्यामू चुपचाप उसी गुफा में पहुँचा। अचानक नीली रोशनी फैली और पत्थर का दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।
सामने गोपाल मुस्कुराता हुआ खड़ा था। उसके पीछे कुसुम भी दिखाई दी। तीनों दोस्त हँस पड़े। उन्होंने रातभर बातें कीं, पुराने किस्से सुनाए और नए अनुभव बाँटे।
सूरज उगने से पहले दरवाजा फिर बंद हो गया। तब से हर पूर्णिमा की रात वह रहस्यमयी दरवाजा कुछ घंटों के लिए खुलता है और गोपाल तथा कुसुम श्यामू से मिलने आते हैं।
यह रहस्य केवल उन तीनों दोस्तों को ही पता है। देवगढ़ के लोग आज भी नहीं जानते कि पूर्णिमा की रात श्यामू जंगल में कहाँ चला जाता है।
मगर आज भी, जब चाँद पूरा गोल होता है और जंगल में नीली रोशनी चमकती है, तब दो दुनियाओं की सीमा पर तीन सच्चे मित्र फिर मिलते हैं।
श्यामू, गोपाल और कुसुम।





