विराज ने क्यों छिपाई अपनी अरबपति होने की पहचान? Billionaire Driver Love Story
मुंबई शहर की खूबसूरत सुबह हमेशा की तरह भागदौड़ से भरी हुई थी। सड़कों पर गाड़ियों की लंबी कतारें थीं और हर इंसान अपने काम में व्यस्त था।
लेकिन उसी भीड़ में एक ऐसी लड़की भी थी, जिसकी पूरी जिंदगी आज एक बड़ी कंपनी में होने वाले इंटरव्यू पर निर्भर थी।
उस लड़की का नाम काव्या शर्मा था। वह हाथ में अपनी फाइल मजबूती से पकड़े बस स्टॉप पर खड़ी थी और बार-बार घड़ी देख रही थी।
उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। उसकी माँ सरला पिछले दो हफ्तों से अस्पताल में भर्ती थीं और पिता गोपाल उम्र के कारण पहले जैसी मेहनत नहीं कर पाते थे।
आज काव्या के लिए नौकरी पाना बेहद जरूरी था, क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। माँ के इलाज का खर्च भी बढ़ता जा रहा था।
इंटरव्यू होने में कुछ ही समय बाकी था। यह किसी छोटी-मोटी कंपनी का नहीं, बल्कि भारत की प्रसिद्ध मल्होत्रा ग्लोबल इंडस्ट्रीज का इंटरव्यू था।
तभी अचानक सड़क पर भारी ट्रैफिक लग गया। काव्या और ज्यादा घबराने लगी। बस आगे नहीं बढ़ रही थी और उसकी आँखों में बेबसी साफ दिखाई दे रही थी।
उसने मन ही मन कहा, “हे भगवान! आज अगर देर हो गई तो मैं क्या करूँगी? यह नौकरी मेरे लिए बहुत जरूरी है।”
अनजान ड्राइवर की मदद, मगर वह था एक अरबपति

तभी उसके सामने एक काली कार आकर रुकी। ड्राइविंग सीट पर बैठा युवक सामान्य कपड़ों में था। उसने खिड़की नीचे करके काव्या से पूछा।
“बहुत परेशान लग रही हैं। आपको कहीं जाना है?” काव्या ने जल्दबाजी में जवाब दिया, “मुझे मल्होत्रा ग्लोबल इंडस्ट्रीज जाना है, इंटरव्यू के लिए।”
“अगर देर हो गई तो मेरी नौकरी हाथ से निकल जाएगी।” युवक मुस्कुराया और बोला, “बैठ जाइए, मैं आपको छोड़ देता हूँ।”
काव्या कार में बैठ गई। उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह किसके साथ बैठी है। उस युवक का नाम विराज था।
विराज अरबों की संपत्ति का वारिस और मल्होत्रा परिवार का इकलौता बेटा था। लेकिन उस समय वह बिल्कुल साधारण ड्राइवर की तरह दिखाई दे रहा था।
रास्ते भर काव्या अपनी परेशानियाँ बताती रही। उसने माँ की बीमारी, घर की खराब हालत और नौकरी की जरूरत के बारे में सबकुछ बताया।
विराज चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा। उसके मन में पहली बार किसी अजनबी लड़की के लिए इतनी गहरी सहानुभूति पैदा हुई थी।
लेकिन ट्रैफिक बहुत ज्यादा था। जब तक वे कंपनी पहुँचे, इंटरव्यू शुरू हुए दस मिनट बीत चुके थे। काव्या घबराकर कार से उतरी और तेजी से अंदर चली गई।
मल्होत्रा ग्लोबल इंडस्ट्रीज की विशाल इमारत देखकर वह कुछ पल के लिए रुक गई। इतनी बड़ी कंपनी में नौकरी मिलना उसके लिए किसी सपने से कम नहीं था।
रिसेप्शन पर पहुँचते ही उसने कहा, “मैम, मेरा इंटरव्यू था। मैं बस दस मिनट लेट हुई हूँ। कृपया मुझे अंदर जाने दीजिए।”
रिसेप्शनिस्ट ने कंप्यूटर देखा और सिर हिलाते हुए कहा, “माफ कीजिए, इंटरव्यू पैनल जा चुका है।” काव्या ने हाथ जोड़कर एक और मौका माँगा।
तभी कंपनी के वरिष्ठ मैनेजर हरिशंकर त्रिपाठी वहाँ आ पहुँचे। काव्या ने उन्हें अपनी मजबूरी बताई, लेकिन कंपनी के नियम तोड़ना उनके लिए आसान नहीं था।
हरिशंकर त्रिपाठी ने कहा, “बेटी, मैं तुम्हारी परेशानी समझ सकता हूँ, लेकिन नियम सबके लिए बराबर हैं।” यह सुनकर काव्या की आँखों में आँसू आ गए।
वह निराश होकर बाहर निकलने लगी। बाहर विराज उसका इंतजार कर रहा था। उसने काव्या का उदास चेहरा देखकर तुरंत पूछा, “क्या हुआ?”
काव्या ने रोते हुए बताया, “मुझे नौकरी नहीं मिली। मैं सिर्फ दस मिनट लेट थी, लेकिन उन्होंने मुझे इंटरव्यू देने का मौका भी नहीं दिया।”
वह फुटपाथ पर बैठकर रोने लगी। विराज का दिल पसीज गया। उसने धीरे से कहा, “अगर मैं तुम्हारी नौकरी लगवा दूँ तो?”
काव्या ने हैरानी से उसकी तरफ देखा और बोली, “क्या तुम सच में ऐसा कर सकते हो?” विराज ने मुस्कुराकर कहा, “एक कोशिश जरूर कर सकता हूँ।”
कुछ देर बाद दोनों अस्पताल पहुँचे। वहाँ डॉक्टर ने बताया कि काव्या की माँ के इलाज में लगभग पाँच लाख रुपये का खर्च आएगा।
यह सुनते ही काव्या और उसके पिता के चेहरे का रंग उड़ गया। सरला ने रोते हुए कहा, “बेटी, मेरा इलाज मत करवाना।”
“मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी बर्बाद हो जाए।” माँ की यह बात सुनकर काव्या खुद को रोक नहीं पाई और रोने लगी।
विराज की आँखें भी नम हो गईं। वह चुपचाप बाहर निकला और अस्पताल के वरिष्ठ अधिकारी से बात करके इलाज का पूरा खर्च अपने ऊपर ले लिया।
लेकिन उसने डॉक्टर से साफ कह दिया कि काव्या को इस बारे में कुछ पता नहीं चलना चाहिए। वह नहीं चाहता था कि लड़की उसकी दौलत के कारण उससे जुड़ाव महसूस करे।
जब इलाज शुरू हुआ तो काव्या हैरान रह गई। उसने विराज से पूछा, “तुमने डॉक्टर से क्या कहा?” विराज मुस्कुराया और बोला।
“बस इतना कि मेरी दोस्त की माँ का इलाज पहले होना चाहिए।” उस दिन पहली बार काव्या के चेहरे पर हल्की मुस्कान लौट आई।
काव्या को बड़ी कंपनी में नौकरी मिलने की खुशखबरी
उसी रात विराज ने अपने मोबाइल से हरिशंकर त्रिपाठी को फोन किया। दूसरी तरफ से आवाज आई, “नमस्ते, विराज बाबू!”
विराज ने कहा, “त्रिपाठी जी, कल जो लड़की आई थी, काव्या, उसके बारे में बात करनी थी।” त्रिपाठी जी बोले, “जी, पहचान गया।”
“वह बहुत विनम्र लड़की थी।” विराज ने कहा, “उसकी फाइल दोबारा देखिए और उसकी योग्यता के अनुसार उसे नौकरी दीजिए।”
हरिशंकर त्रिपाठी कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, “अगर आपकी नजर में वह योग्य है तो मुझे कोई परेशानी नहीं है।”
विराज ने कहा, “उसे ऐसी पोस्ट दीजिएगा, जहाँ उसकी मेहनत दिखे और वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ सके।” त्रिपाठी जी ने हामी भर दी।
अगली सुबह काव्या के फोन की घंटी बजी। उसने फोन उठाया तो दूसरी तरफ मल्होत्रा ग्लोबल इंडस्ट्रीज का एचआर विभाग था।
उन्होंने कहा, “काव्या जी, आपको कंपनी में नियुक्त किया जाता है। आज दोपहर तक जॉइन कर लीजिए।” कुछ सेकंड तक उसे विश्वास ही नहीं हुआ।
सच में उसकी नौकरी लग गई थी। फोन कटते ही उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। वह सबसे पहले अस्पताल पहुँची और माँ को खुशखबरी सुनाई।
सरला और गोपाल की आँखों में भी खुशी छलक उठी। माँ ने काव्या का हाथ पकड़कर कहा, “बेटी, भगवान तुम्हारी सारी मुश्किलें दूर करे।”
थोड़ी देर बाद काव्या दौड़ती हुई बाहर गई, जहाँ विराज कार के पास खड़ा था। उसने खुशी से कहा, “विराज, मेरी नौकरी लग गई!”
खुशी के मारे उसने बिना सोचे-समझे विराज का हाथ पकड़ लिया। विराज मुस्कुरा उठा और बोला, “मैंने कहा था ना कि सब ठीक हो जाएगा।”
काव्या ने भावुक होकर कहा, “अगर तुम मेरी जिंदगी में नहीं होते तो शायद मैं सबकुछ हार जाती। तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया है।”
विराज ने मजाक करते हुए कहा, “तो अब अपने वादे के हिसाब से मुझे हमेशा अपना ड्राइवर रखोगी ना?” पहली बार काव्या खुलकर हँस पड़ी।
उसने कहा, “हाँ, बिल्कुल रखूँगी।” विराज कुछ क्षण उसे देखता रहा। उसके चेहरे की खुशी देखकर उसे लगा, जैसे उसने दुनिया की सबसे बड़ी दौलत पा ली हो।
काव्या की आँखों में खुशी के आँसू देखकर विराज ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया। काव्या ने भी हाथ नहीं हटाया और मुस्कुराकर उसकी तरफ देखने लगी।
विराज ने पूछा, “क्या मैं तुम्हें गले लगा सकता हूँ?” काव्या ने हल्के से सिर हिलाया। विराज ने उसे प्यार से अपनी बाँहों में भर लिया।
उस छोटे-से आलिंगन में दोनों को एक अनकहा अपनापन महसूस हुआ। काव्या ने कुछ पल बाद खुद को अलग किया, लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान बनी रही।
विराज ने कहा, “आज तुम्हारी नौकरी लगने की खुशी में हम कहीं अच्छी जगह खाना खाने चलते हैं।” काव्या हैरानी से बोली, “कहाँ?”
विराज ने शरारती मुस्कान के साथ कहा, “सरप्राइज है।” काव्या हँस पड़ी। उसे नहीं पता था कि यह छोटा-सा सरप्राइज उसकी जिंदगी का एक बड़ा रहस्य खोलने वाला है।
बारिश, होटल का राज और साजिश का खेल
उस शाम आसमान धीरे-धीरे काला पड़ने लगा था। मुंबई की हवा में अजीब-सी बेचैनी थी और ऑफिस की खिड़कियों से बाहर बादल तेजी से घिरते दिखाई दे रहे थे।
ऑफिस का काम खत्म होते-होते बारिश शुरू हो चुकी थी। कुछ ही देर में आसमान से तेज मूसलाधार बारिश होने लगी और सड़कें पानी से भर गईं।
काव्या बाहर निकली तो उसकी फाइल भीगने लगी। उसने जल्दी से अपना बैग ऊपर किया और दौड़ने लगी, लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
उसी समय विराज अपनी कार लेकर बाहर आया। उसने दूर से देखा कि काव्या भीगते हुए बस स्टैंड की तरफ जा रही है।
वह तुरंत कार रोककर उसके पास पहुँचा और आवाज लगाई, “काव्या, इधर आओ, जल्दी!” काव्या भागकर कार में बैठ गई, लेकिन पूरी तरह भीग चुकी थी।
उसके बाल चेहरे पर चिपक गए थे और कपड़े बारिश से भारी हो गए थे। विराज ने चिंता से पूछा, “इतनी तेज बारिश में तुम अकेली कैसे जाओगी?”
काव्या काँपती आवाज में बोली, “घर जाना जरूरी है, माँ की दवाई लानी है। लेकिन रास्ता पूरा बंद लग रहा है।”
विराज कुछ देर खामोश रहा। वह जानता था कि अगर वह काव्या को ऐसे ही घर छोड़ेगा तो वह बीमार पड़ सकती है।
बारिश बहुत तेज थी। तभी विराज ने अचानक कार मोड़ दी। काव्या ने पूछा, “कहाँ जा रहे हो?” विराज ने हल्के से मुस्कुराकर जवाब दिया।
“घर नहीं, आज बाहर खाना खाते हैं।” काव्या चौंक गई और बोली, “क्या? इस बारिश में और मैं इस हालत में?”
विराज ने कहा, “तुम अभी घर जाओगी तो बीमार पड़ जाओगी। वैसे भी आज तुम्हारी नौकरी लगने की खुशी है, तो छोटा-सा जश्न बनता है।”
काव्या कुछ समझ नहीं पाई, लेकिन अपनी हालत देखकर उसने मना भी नहीं किया। कुछ देर बाद कार मुंबई के एक बेहद आलीशान होटल की ओर बढ़ रही थी।
उस होटल का नाम था द रॉयल क्राउन ग्रैंड। बारिश अब और तेज हो चुकी थी। होटल की चमकदार लाइटें बारिश की बूँदों में बेहद खूबसूरत लग रही थीं।
विराज ने एक गहरी साँस ली। उसे पता था कि आज वह काव्या को सिर्फ खाना नहीं खिला रहा था, बल्कि अनजाने में अपने रहस्य के करीब ले जा रहा था।
होटल के बाहर गार्ड खड़े थे। जैसे ही विराज और काव्या अंदर जाने लगे, गार्ड उन्हें रोकने के लिए आगे आ गए।
एक गार्ड ने ताना मारते हुए कहा, “यह कोई सड़क नहीं है। अंदर जाना है तो ठीक कपड़े और स्टेटस होना चाहिए।”
काव्या का चेहरा शर्म से झुक गया। उसे पहली बार लगा कि शायद वह सचमुच इस आलीशान जगह के लायक नहीं है। लेकिन विराज शांत खड़ा रहा।
उसने अपना फोन निकाला और एक नंबर डायल किया। फिर सिर्फ इतना कहा, “मैं नीचे हूँ, गेट पर।” फोन काटते ही होटल में हलचल मच गई।
जनरल मैनेजर भागता हुआ बाहर आया। जैसे ही उसने विराज को देखा, उसके चेहरे का रंग उड़ गया और वह सम्मान से बोला, “सर, आप बाहर क्यों खड़े हैं?”
पूरा स्टाफ सुन्न पड़ गया। जो लोग कुछ मिनट पहले काव्या का मजाक उड़ा रहे थे, अब वही सिर झुकाकर खड़े थे।
काव्या यह सब देखकर पूरी तरह हैरान थी। उसके मन में सवाल उठा, “एक साधारण ड्राइवर को इतना सम्मान क्यों मिल रहा है?” लेकिन विराज ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने सिर्फ काव्या का हाथ थामा और उसे अंदर चलने को कहा। काव्या उसके साथ चल तो पड़ी, लेकिन उसके मन में सवाल लगातार बढ़ते जा रहे थे।
काव्या को होटल में विराज पर हुआ शक

होटल को बहुत ही खास तरीके से सजाया गया था। हर कर्मचारी उन्हें सम्मान दे रहा था, जबकि काव्या को विराज की असली पहचान का कोई अंदाजा नहीं था।
उसे एक शानदार टेबल पर बैठाया गया। बारिश की आवाज अब भी खिड़कियों पर पड़ रही थी, लेकिन अंदर का माहौल बेहद शांत और खूबसूरत था।
काव्या ने धीरे से विराज से पूछा, “तुम सच में कौन हो, विराज? यहाँ सब तुम्हें इतना सम्मान क्यों दे रहे हैं?”
विराज ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “मैं वही हूँ, जो तुम जानती हो।” लेकिन उसकी आँखों में ऐसा सच था, जिसे वह अभी छिपा रहा था।
खाना शुरू हुआ, लेकिन काव्या के मन में सवाल खत्म नहीं हो रहे थे। उसे लग रहा था कि विराज उससे कोई बहुत बड़ी बात छिपा रहा है।
विराज बीच-बीच में काव्या को चुपके से देख रहा था। कभी वह उसके मुस्कुराते चेहरे को देखता, तो कभी खाने के दौरान उसकी छोटी-छोटी आदतों पर ध्यान देता।
काव्या को सब पता था कि विराज उसे देख रहा है। वह जानबूझकर अनजान बनने का नाटक करती और फिर अचानक उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा देती।
विराज नजरें हटाकर दूसरी तरफ देखने लगता। काव्या की इस शरारत पर उसके चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती। दोनों के बीच एक प्यारा-सा अपनापन पनपने लगा था।
कुछ देर बाद काव्या ने मन ही मन सोचा, “विराज कितना अच्छा है! उसने मेरी हर मुश्किल में साथ दिया है। काश, यह लड़का मेरी जिंदगी में आ जाए।”
यह सोचकर उसके गाल हल्के से लाल हो गए। उसने तुरंत पानी का गिलास उठा लिया, ताकि विराज उसकी शर्माती हुई मुस्कान न देख सके।
दूसरी तरफ रिया कपूर ऑफिस में गुस्से में बैठी थी। उसे यह बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि काव्या हर बार मुसीबत से बच कैसे जाती है।
उसने मन ही मन तय कर लिया कि अब वह काव्या को किसी भी कीमत पर गिराएगी। उसने कंपनी के कुछ पुराने दस्तावेज खोले और एक नई साजिश रचने लगी।
रिया ने धीरे से कहा, “अब देखती हूँ, तेरा खेल कितना चलता है। अगर इस बार मेरा दाँव सही पड़ा तो तेरी नौकरी हमेशा के लिए चली जाएगी।”
कंपनी में बढ़ती जिम्मेदारी और विराज की चिंता
समय बीतने के साथ कंपनी का माहौल पहले से बेहतर हो चुका था। काव्या अपनी मेहनत और ईमानदारी के कारण मल्होत्रा ग्लोबल इंडस्ट्रीज की जानी-मानी अधिकारियों में गिनी जाने लगी।
हरिशंकर त्रिपाठी भी उसकी लगन से बहुत प्रभावित थे। वहीं दूसरी तरफ रिया कपूर काव्या से अब भी उतनी ही नफरत करती थी।
काव्या ने रिया की गलतियों को माफ कर दिया था, लेकिन रिया को वह माफी नहीं, बल्कि अपनी हार लगती थी। उसके मन में बदले की आग लगातार बढ़ रही थी।
एक सुबह कंपनी की बड़ी मीटिंग बुलाई गई। हरिशंकर त्रिपाठी ने घोषणा की कि कंपनी का एक महत्वपूर्ण इंटरनेशनल प्रोजेक्ट दुबई में शुरू होने वाला है।
इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी काव्या को सौंपी गई। यह सुनकर पूरा कॉन्फ्रेंस हॉल तालियों से गूंज उठा और काव्या के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई देने लगी।
यह उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा अवसर था। लेकिन मीटिंग खत्म होते ही विराज के चेहरे पर चिंता नजर आने लगी।
शाम को जब विराज काव्या को घर छोड़ने जा रहा था, तब उसने मुस्कुराकर पूछा, “तुम मेरे लिए खुश नहीं हो क्या? तुम्हारा चेहरा इतना उदास क्यों है?”
विराज ने हल्की मुस्कान दी, लेकिन कुछ बोला नहीं। तब काव्या ने कहा, “मुझे दुबई जाने से मत रोकना। मैं यह मौका खोना नहीं चाहती।”
विराज कुछ देर खामोश रहा, फिर बोला, “ठीक है, लेकिन अपना ख्याल रखना। वहाँ किसी अनजान व्यक्ति पर जल्दी भरोसा मत करना।”
काव्या ने हँसते हुए कहा, “तुम भी चलो ना। तुम्हारे साथ रहूँगी तो मुझे किसी बात की चिंता नहीं होगी।”
यह सुनकर विराज चौंक गया। उसके दिल में खुशी की लहर दौड़ गई, लेकिन वह अपनी असली पहचान छिपाए रखना चाहता था।
उसी रात विराज ने हरिशंकर त्रिपाठी को फोन किया। उसने कहा कि उसकी और काव्या की फ्लाइट अलग-अलग होनी चाहिए और होटल भी अलग बुक किए जाएँ।
हरिशंकर त्रिपाठी समझ गए कि विराज अभी भी अपनी असली पहचान छिपाना चाहते हैं। उन्होंने बिना सवाल किए सारी व्यवस्था कर दी।
काव्या को यह बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन उसने ज्यादा सवाल नहीं किया। वह अपने नए प्रोजेक्ट को लेकर उत्साहित थी और आने वाले काम की तैयारी करने लगी।
रिया कपूर का दुबई में शुरू हुआ खेल
कुछ दिनों बाद पूरी टीम दुबई पहुँच गई। काँच की ऊँची-ऊँची इमारतें, चमकती सड़कें और शानदार होटल देखकर काव्या बेहद खुश थी।
वह पहली बार विदेश आई थी। कंपनी की मीटिंग बहुत अच्छी चल रही थी और हरिशंकर त्रिपाठी बार-बार उसकी मेहनत की तारीफ कर रहे थे।
लेकिन रिया कपूर उससे बहुत नफरत कर रही थी। उसने मन ही मन ठान लिया कि इस बार काव्या को ऐसा नुकसान पहुँचाएगी, जिससे वह खुद को संभाल भी नहीं सकेगी।
उसने कुछ लोगों से संपर्क किया और एक खतरनाक योजना बनाई। योजना यह थी कि काव्या को नकली बिजनेस मीटिंग के बहाने सुनसान जगह बुलाया जाए।
अगले दिन शाम को रिया ने काव्या से कहा, “एक बड़ा क्लाइंट तुमसे अकेले में मिलना चाहता है। अगर डील फाइनल हो गई तो कंपनी को बड़ा फायदा होगा।”
काव्या ने बिना शक किए हामी भर दी। उसे अपनी जिम्मेदारी पर भरोसा था और वह नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से कंपनी का कोई अवसर छूट जाए।
तय समय पर काव्या एक सुनसान इंडस्ट्रियल इलाके में पहुँची। वहाँ एक पुरानी बिल्डिंग थी। जैसे ही वह अंदर गई, पीछे का दरवाजा बंद हो गया।
चारों तरफ अँधेरा और सन्नाटा था। काव्या घबरा गई। तभी ऊपर से ताली बजाने की आवाज आई और रिया कपूर दो गुंडों के साथ सामने आ गई।
काव्या ने हैरानी से पूछा, “तुम यहाँ क्या कर रही हो?” रिया हँसने लगी और बोली, “हाँ, मैं ही हूँ। तुमने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी।”
“अब तुम्हारी बारी है।” काव्या समझ चुकी थी कि यह कोई साधारण मजाक नहीं था। उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई देने लगा।
उसने पीछे हटते हुए कहा, “रिया, तुम जो कर रही हो, वह गलत है। मुझे जाने दो। मैंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा।”
लेकिन रिया पर बदले का जुनून सवार था। उसने अपने साथ आए दोनों गुंडों को काव्या पर नजर रखने का इशारा किया।
अचानक विराज का तूफानी आगमन

उसी समय विराज को उसकी निजी सुरक्षा प्रणाली से अलर्ट मिला। काव्या का लोकेशन सिग्नल अचानक गायब हो गया था और उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
उसे तुरंत महसूस हो गया कि कुछ गलत हुआ है। उसने अपनी सिक्योरिटी टीम को जाँच के लिए कहा और खुद प्राइवेट जेट से दुबई निकल गया।
कुछ घंटों बाद उसका विमान दुबई के एयरपोर्ट पर पहुँचा। वहाँ से वह सीधे उस इलाके में गया, जहाँ आखिरी बार काव्या का लोकेशन मिल रहा था।
उसकी सिक्योरिटी टीम ने आसपास की जानकारी जुटाई और संदिग्ध बिल्डिंग का पता लगाया। विराज ने टीम को चारों तरफ तैनात रहने को कहा और खुद अंदर चला गया।
बिल्डिंग के अंदर जाते ही उसके सामने दो गुंडे आ गए। उन्होंने विराज का रास्ता रोक लिया और उनमें से एक ने उस पर हमला कर दिया।
विराज ने उसका हाथ पकड़कर मोड़ दिया और उसे जमीन पर गिरा दिया। दूसरा गुंडा पीछे से आया, लेकिन विराज ने उसे भी जोरदार मुक्का मारा।
दोनों गुंडों ने दोबारा हमला करने की कोशिश की, मगर विराज ने हिम्मत नहीं हारी। कुछ देर की हाथापाई के बाद दोनों जमीन पर गिर पड़े।
काँच टूट चुके थे और कुर्सियाँ इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। विराज को अपने शरीर की चोटों की परवाह नहीं थी, क्योंकि उसे सिर्फ काव्या की चिंता थी।
उसकी सिक्योरिटी टीम ने पूरे इलाके को घेर लिया। रिया यह सब देखकर बहुत डर गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक साधारण ड्राइवर के पास इतनी बड़ी सुरक्षा टीम कैसे हो सकती है।
विराज ने रिया की तरफ ध्यान दिए बिना काव्या को ढूँढ़ना शुरू किया। आखिरकार उसे काव्या एक कमरे में डरी-सहमी खड़ी दिखाई दी।
काव्या की आँखों में आँसू थे। विराज को देखते ही वह उसकी तरफ दौड़ी। विराज ने उसे सुरक्षित देखकर राहत की साँस ली और पूछा, “तुम ठीक तो हो?”
काव्या ने रोते हुए सिर हिलाया। विराज ने उसके कंधे थामकर कहा, “डरो मत, अब मैं आ गया हूँ। तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।”
काव्या ने पहली बार महसूस किया कि विराज के लिए उसकी सुरक्षा कितनी मायने रखती है। वह भावुक होकर उससे लिपट गई और देर तक रोती रही।
विराज ने उसे अपनी बाँहों में थामे रखा। उसके बालों पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोला, “सब ठीक हो जाएगा। अब तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता।”
विराज नहीं, विराज मल्होत्रा; अब सच आया सामने
कुछ देर बाद काव्या ने खुद को संभाला। उसने विराज की तरफ देखा और पूछा, “आखिर तुम हो कौन? तुम्हारे पास इतनी बड़ी सिक्योरिटी टीम कैसे है?”
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। विराज ने लंबी साँस ली। अब सच छिपाने का कोई मतलब नहीं था। उसने काव्या की आँखों में देखते हुए कहा।
“मैं विराज मल्होत्रा हूँ। मल्होत्रा ग्लोबल इंडस्ट्रीज का मालिक और उस परिवार का वारिस, जिसके नाम पर यह कंपनी चलती है।”
यह सुनकर काव्या की आँखें खुली की खुली रह गईं। जिस इंसान को वह साधारण ड्राइवर समझती रही, वह इतनी बड़ी कंपनी का मालिक निकला।
उसके मन में गुस्सा भी था, हैरानी भी और कहीं न कहीं सुकून भी। लेकिन सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि विराज ने उससे अपनी पहचान छिपाई थी।
विराज ने उसकी तरफ बढ़ते हुए कहा, “काव्या, मैं तुम्हें सबकुछ समझाऊँगा। लेकिन अभी सबसे जरूरी है कि तुम सुरक्षित रहो।”
पुलिस को बुलाया गया और रिया की सारी सच्चाई सामने आ गई। उसका रचा हुआ खेल सबके सामने खुल गया और उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
बाद में अदालत में उसके अपराध साबित हुए और उसे जेल की सजा सुनाई गई। काव्या इस पूरे घटनाक्रम से बेहद परेशान थी और चुपचाप विराज के साथ वापस लौट आई।
विराज ने उससे कई बार बात करने की कोशिश की, लेकिन काव्या के मन में छिपी पहचान का दर्द अभी भी कम नहीं हुआ था।
विराज और काव्या के बीच बढ़ती दूरी
मुंबई लौटने के बाद काव्या और विराज के बीच कई दिनों तक बहुत कम बातचीत हुई। काव्या को सबसे बड़ा दुख इस बात का था कि विराज ने उससे सच्चाई छिपाई।
वह सोचती थी कि अगर विराज इतना अमीर था तो उसने शुरुआत में ही अपनी पहचान क्यों नहीं बताई। क्या वह उसकी मजबूरी देखकर उस पर दया कर रहा था?
लेकिन दूसरी तरफ वह यह भी जानती थी कि उसकी माँ का इलाज, उसकी नौकरी और हर मुश्किल में साथ खड़ा रहने वाला वही था।
कई बार काव्या का मन विराज से बात करने को करता, लेकिन उसकी छिपाई हुई पहचान याद आते ही वह खुद को रोक लेती।
उधर विराज भी काव्या की खामोशी से परेशान था। वह उसे खोना नहीं चाहता था, लेकिन उसे यह भी समझ आ रहा था कि उसका भरोसा दोबारा जीतना आसान नहीं होगा।
एक शाम विराज ने काव्या को समुद्र किनारे मिलने बुलाया। आसमान में डूबते सूरज की लालिमा फैली हुई थी और समुद्र की लहरें लगातार किनारे से टकरा रही थीं।
दोनों कुछ देर खामोश खड़े रहे। विराज ने आखिरकार कहा, “काव्या, मैं जानता हूँ कि तुम मुझसे नाराज हो। लेकिन एक बार मेरी बात सुन लो।”
काव्या ने आँसू भरी आँखों से उसकी तरफ देखा। विराज बोला, “मैंने तुमसे झूठ नहीं बोला था, बस अपनी पहचान छिपाई थी।”
“मैं जानना चाहता था कि कोई मुझे मेरे पैसों के लिए पसंद करता है या मेरे दिल और इंसानियत के लिए।”
काव्या की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कहा, “अगर मैं तुम्हें सिर्फ ड्राइवर समझकर सम्मान दे सकती हूँ, तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारा सच जानने के बाद भी तुम्हें स्वीकार करती?”
“तुमने मुझे कभी यह मौका ही नहीं दिया कि मैं तुम्हें तुम्हारी असली पहचान के साथ जान सकूँ। मुझे तुम्हारी दौलत नहीं, तुम्हारा भरोसा चाहिए था।”
यह सुनकर विराज की आँखें नम हो गईं। उसने धीरे से काव्या का हाथ अपने हाथों में लिया और कहा, “मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।”
“शायद उस दिन से, जिस दिन तुम अपनी माँ के लिए रो रही थी और खुद से ज्यादा उनकी चिंता कर रही थी। उसी दिन तुम मेरे दिल में बस गई थीं।”
काव्या ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन आँखों में अभी भी आँसू थे। उसने धीरे से अपना सिर विराज के कंधे पर रख दिया।
विराज ने उसे प्यार से अपनी बाँहों में भर लिया। काव्या ने भी उसे कसकर गले लगा लिया, जैसे कई दिनों से मन में दबे सारे भाव आँसुओं के साथ बाहर आ रहे हों।
कुछ पल बाद काव्या ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। विराज ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा, “क्या अब भी मुझसे नाराज हो?”
काव्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “थोड़ी-सी नाराजगी अभी बाकी है, लेकिन अब तुम्हें उसे दूर करना होगा।” विराज मुस्कुराया और उसके करीब आया।
काव्या ने भी अपनी आँखें बंद कर लीं। विराज ने उसकी सहमति समझकर उसके माथे को चूमा और फिर दोनों के बीच एक छोटा-सा प्यार भरा चुंबन हुआ।
उस पल दोनों के दिलों में जमा कई दिनों की दूरी कुछ कम हो गई। समुद्र की लहरों के बीच उन्हें लगा कि शायद उनका रिश्ता अब एक नई शुरुआत कर रहा है।
दूर खड़े राजेश मल्होत्रा यह सब देख रहे थे। उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्हें आखिर वह लड़की मिल गई थी, जो उनके बेटे से उसकी दौलत नहीं, बल्कि दिल से प्यार करती थी।
विराज और काव्या की सगाई, प्यार को मिला नया नाम

कुछ महीनों बाद परिवार और कंपनी के कर्मचारियों की मौजूदगी में विराज और काव्या की सगाई हुई। हरिशंकर त्रिपाठी की आँखों में गर्व था और काव्या की माँ की आँखों में खुशी।
सरला ने अपनी बेटी को दुल्हन की तरह सजा देखकर उसे गले लगा लिया। उनकी आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे। उन्हें अपनी बेटी की जिंदगी सँवरती दिखाई दे रही थी।
विराज के चेहरे पर वह सुकून था, जो उसे अपने अरबपति पिता के घर में भी नहीं मिला था। अब उसे अपनी जिंदगी में सच्चा प्यार मिल चुका था।
काव्या भी विराज को पाकर बहुत खुश थी। उसे यह बात सबसे ज्यादा अच्छी लगती थी कि विराज इतना अमीर होकर भी दिल से सरल और दूसरों की मदद करने वाला इंसान था।
सगाई के बाद विराज ने काव्या का हाथ थामकर कहा, “अब तुम्हें कभी अकेले किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा।”
काव्या मुस्कुराई और बोली, “और अब तुम्हें अपनी कोई बात मुझसे छिपानी नहीं होगी।” विराज हँस पड़ा और उसने वादा किया कि आगे से दोनों के बीच कोई राज नहीं रहेगा।
आखिरकार विराज के पिता राजेश मल्होत्रा को भी एक अच्छी और संस्कारी बहू मिल गई। उनके चेहरे पर अपने बेटे की खुशी देखकर संतोष साफ दिखाई दे रहा था।
और सबसे बड़ी बात, उनका बेटा अब घर छोड़कर नहीं भागेगा, क्योंकि काव्या उसकी जिंदगी में आ चुकी थी। अब उसे प्यार करने और संभालने वाली कोई मिल गई थी।





