नरभक्षी बैलगाड़ी वाला धुंधगाँव के जंगल में रात होते ही अपने अगले शिकार की तलाश में निकलता था। हर कोई उससे डरता था।
कहा जाता था कि उसकी बैलगाड़ी की घंटियाँ सुनते ही मौत इंसान के बिल्कुल करीब पहुँच जाती थी। कोई बच नहीं पाता था।
जब रामप्रसाद और उसकी बेटी सुमन पर उस नरभक्षी की बुरी नजर पड़ी, तब पूरे गाँव में दहशत फैल गई। हर रात नया डर जन्म लेने लगा।
सुमन को बचाने के लिए रवि ने अपनी जान की परवाह किए बिना उस खौफनाक जंगल में कदम रखा। वहाँ उसका सामना एक भयानक रहस्य से हुआ।
क्या रवि नरभक्षी बैलगाड़ी वाले छाया सिंह को हमेशा के लिए खत्म कर पाएगा, या वह फिर किसी नए शिकार की तलाश में लौट आएगा?
गाँव के जंगल में एक भयानक बैलगाड़ी वाला। Horror Story In Hindi
‘धुंधगाँव’—यह नाम सुनते ही आसपास के गाँवों के लोगों के चेहरे उतर जाते थे। कहा जाता था कि इस गाँव पर कई सालों से किसी अनदेखी शक्ति का साया था। यहाँ दिन में भी धुएँ सा माहौल रहता था और रात में धुंध छाई रहती थी।
रात होते-होते पूरा गाँव ऐसा लगता था जैसे अंधेरे ने उसे निगल लिया हो।
धुंधगाँव के चारों तरफ घना जंगल फैला हुआ था। इतना घना कि दोपहर में भी सूरज की रोशनी जमीन तक नहीं पहुँचती थी। पेड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ हवा चलने पर ऐसे हिलती थीं जैसे कोई लंबी उँगलियाँ लोगों को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा रहा हो।
गाँव के बूढ़े कहते थे कि उस जंगल में रात के समय इंसानों की नहीं, बल्कि किसी और चीज़ की आवाजें गूँजती हैं—कभी किसी औरत के रोने की आवाज, तो कभी बच्चे की चीख और कभी बैलों की धीमी खनखनाहट।
धुंधगाँव से बाहर जाने का सिर्फ एक ही रास्ता था—एक पुराना कीचड़ भरा रास्ता, जो सीधे जंगल के बीच से गुजरता था। बारिश के दिनों में वह रास्ता दलदल बन जाता था। कई बार बैलगाड़ी उसमें आधी धंस जाती थी।
लेकिन असली डर कीचड़ या अंधेरे का नहीं था, डर था उस रास्ते पर रात में दिखाई देने वाली बैलगाड़ी का!
गाँव में कोई भी आदमी सूरज ढलने के बाद उस रास्ते पर अकेले जाने की हिम्मत बिल्कुल नहीं करता था। और जो कोई मजबूरी में गया, वह शायद ही कभी वापस लौटता था।
भयानक नरभक्षी बैलगाड़ी वाला छाया सिंह
कई साल पहले की बात है—एक व्यापारी रात में शहर से लौट रहा था। तभी अचानक रास्ते में उसे एक बैलगाड़ी दिखाई दी। बैलगाड़ी वाला एक लंबा-चौड़ा आदमी था। उसने धीमी आवाज में कहा, “बैठ जाओ मालिक, इतनी गहरी रात है और रात में यह जंगल सुरक्षित नहीं।”
व्यापारी बहुत ज्यादा डर गया था, इसलिए वह तुरंत बैलगाड़ी में बैठ गया। लेकिन अगले दिन उसकी लाश जंगल के बीचों-बीच मिली। उस व्यापारी का शरीर आधा मिट्टी में दबा हुआ था और आँखें पूरी तरह खुली हुई थीं, जैसे मरने से पहले उसने कुछ ऐसा भयानक देख लिया हो जिसे शायद इंसान कभी सहन नहीं कर सकता।
उसके बाद बैलगाड़ी वाले को गाँव वालों ने एक नाम दिया—”नरभक्षी बैलगाड़ी वाला”।
लोग कहते थे कि वह कोई इंसान नहीं, बल्कि एक खतरनाक जिन्न था—एक ऐसा जिन्न जो रात में मुसाफिरों का शिकार करता था।
धुंधगाँव में बारिश बहुत होती थी। कई-कई दिनों तक आसमान से पानी बरसता रहता था। रात के समय जब बिजली चमकती, तो जंगल के पेड़ों के बीच कुछ परछतियाँ भागती हुई दिखाई देती थीं।
गाँव की औरतें शाम होने से पहले अपने बच्चों को घरों के अंदर बंद कर लेती थीं। दरवाज़ों पर नींबू-मिर्च टाँगे जाते व मंत्र पढ़े जाते थे। लेकिन फिर भी रात होते ही पूरे गाँव में डर फैल जाता था।
सबसे ज्यादा डरावनी होती थीं सर्दियों की रातें। उस समय जब धुंध इतनी घनी हो जाती थी कि इंसान अपना हाथ तक नहीं देख सकता था, उन्हीं रातों में दूर कहीं बैलों की घंटियों की आवाज सुनाई देती—ठनन….ठनन….ठनन।
बैलों की आवाज धीरे-धीरे गाँव के करीब आती और सबको डराकर फिर अचानक बंद हो जाती। गाँव के बूढ़े कहते थे, “जिस रात घंटियों की आवाज घर के सामने रुक जाए… समझ लो मौत दरवाजे पर ही खड़ी है।”
कई लोगों ने दावा किया था कि उन्होंने उस बैलगाड़ी वाले को देखा है। उसका चेहरा हमेशा धुंध में छिपा रहता था, सिर्फ उसकी लाल चमकती आँखें दिखाई देती थीं। कहते हैं उसके बैल भी सामान्य नहीं थे—उनकी आँखें कोयले की तरह चमकती थीं और उनके पैरों की आवाज जमीन पर नहीं सुनाई देती थी, वो तो जैसे हवा में चल रहे हों।
एक बार चार लड़कों ने मिलकर सच जानने की कोशिश की और वे रात में मशाल लेकर जंगल में गए। पूरी रात बीत गई, लेकिन सुबह सिर्फ उनकी टूटी हुई मशालें ही मिलीं। वे चार लड़के कभी वापस नहीं आए।
अब गाँव की कई सुंदर लड़कियाँ भी गायब होने लगीं! क्योंकि अब वह नरभक्षी बैलगाड़ी वाला सबको छोड़, लड़कियों को उस जंगल में अपने जादू से बुलाने लगा और उनके साथ भगवान जाने क्या करने लगा… मगर वे लड़कियाँ आज तक वापस नहीं आईं।
उस घटना के बाद लोगों ने शहर जाने वाला वह रास्ता ही छोड़ दिया। धीरे-धीरे जंगल के दूसरी तरफ नया रास्ता बनाया गया। लेकिन डर आज भी खत्म नहीं हुआ था, क्योंकि रात होते ही पुराना रास्ता फिर से जिंदा हो जाता था।
गाँव की सुमन पर नरभक्षी बैलगाड़ी वाले छाया सिंह की गंदी नजर

धुंधगाँव के किनारे एक छोटा सा खेत था। वहाँ रामप्रसाद अपनी बेटी सुमन के साथ अपने खेतों में काम करता था। कई बार काम ज्यादा होने के कारण उन दोनों को रात भर खेतों में ही रहना पड़ता था।
उनका खेत जंगल से बिल्कुल सटा हुआ था। रामप्रसाद ने रात में अपने खेतों के पास कई बार किसी को खड़े देखा था—एक लंबी काली परछाई, जो थोड़ी ही देर में धुंध में गायब हो जाती थी।
खेतों के पास घर के अंदर भी रामप्रसाद को कुत्तों के जोर-जोर से भौंकने की आवाजें आती थीं। मगर जैसे ही रामप्रसाद बाहर आता, तो चारों तरफ सिर्फ धुंध ही होती।
एक रात बारिश बहुत तेज हो रही थी। आसमान में बिजली चमक रही थी। तभी रामप्रसाद को दूर रास्ते पर एक बैलगाड़ी दिखाई दी। बैलगाड़ी धीरे-धीरे उसके खेत की तरफ ही आ रही थी। उसके बैलों की घंटियाँ बारिश के शोर में भी साफ सुनाई दे रही थीं। यह देखकर रामप्रसाद का गला सूख गया, क्योंकि पहली बार गाँव के अंदर बैलगाड़ी आई थी।
तभी अचानक बिजली जोर से चमकी और एक पल के लिए बैलगाड़ी वाले का चेहरा बिल्कुल साफ दिखाई दिया। उसका चेहरा इंसान का नहीं था। उस नरभक्षी की आँखें पूरी तरह काली थीं और होंठों के बीच लंबे नुकीले दाँत चमक रहे थे। कुल मिलाकर वह बैलगाड़ी वाला बहुत ही भयंकर लग रहा था। वह रामप्रसाद को घूरकर देख रहा था।
रामप्रसाद डर के मारे जमीन पर गिर पड़ा। जब उसने दोबारा नजर उठाई, वहाँ से बैलगाड़ी गायब थी।
अगले दिन उसने यह बात पूरे गाँव को बताई, लेकिन कोई भी उसकी मदद के लिए तैयार नहीं हुआ, क्योंकि धुंधगाँव के लोग जानते थे कि जिसे नरभक्षी बैलगाड़ी वाला देख लेता है, उसका बचना बिल्कुल नामुमकिन होता है।
उस रात के बाद रामप्रसाद की नींद पूरी तरह से उड़ गई थी। हर शाम होते ही वह अपनी बेटी सुमन को घर के अंदर बंद कर देता और दरवाजे पर नींबू-मिर्च लटका देता। लेकिन उसकी बेटी सुमन को यह सब अंधविश्वास लगता था। उसे लगता था कि गाँव वाले डर के मारे कहानियाँ बनाते हैं।
सिर्फ रवि ही था जो रामप्रसाद की बातें गंभीरता से सुनता था। रवि गाँव का सबसे बहादुर लड़का था—लंबा, ताकतवर और निडर। वह बचपन से ही सुमन से प्यार करता था।
एक शाम हल्की बारिश हो रही थी। सुमन और रवि खेत के पास घास के ढेर पर बैठे बातें कर रहे थे। चारों तरफ धुंध फैली हुई थी और दूर जंगल से अजीब सी आवाजें आ रही थीं। तभी अचानक रवि की नजर जंगल की तरफ गई। धुंध के बीच कोई खड़ा था—एक लंबा काला साया, जिसकी दो लाल आँखें अंधेरे में जल रही थीं।
रवि तुरंत खड़ा हो गया, लेकिन अगले ही पल बिजली चमकी… और वह साया गायब हो गया।
उसी रात पहली बार सुमन ने अपने घर के बाहर बैलों की घंटियों की आवाज सुनी—ठन… ठन… ठन। आवाज धीरे-धीरे उनके दरवाजे तक आई और फिर अचानक रुक गई।
अब रामप्रसाद और सुमन बहुत घबरा गए, क्योंकि गाँव वालों ने कहा था कि “जिस रात बैलों की घंटियाँ जिसके दरवाजे पर रुक जाएँ… समझ लो नरभक्षी जिन्न ने तुम्हें चुन लिया है।” यह सोच-सोचकर रामप्रसाद और उसकी बेटी गले लगकर चुपचाप खूब रोने लगे। वे धीरे-धीरे इसलिए रो रहे थे क्योंकि शायद उनके दरवाजे पर वह नरभक्षी ही खड़ा था।
अगले दिन से ही अजीब-अजीब घटनाएँ होना शुरू हो गईं। रात में घर की खिड़कियों पर किसी के नाखून रगड़ने की आवाज आती, तो कभी खेतों में बैलगाड़ी के पहियों के निशान दिखाई देते। एक तो रामप्रसाद का खेत जंगल के पास ही था और घर खेतों से थोड़ा ही दूर। मतलब रामप्रसाद का घर और खेत जंगल के पास ही था और गाँव से दूर।
जंगल में मौत का सामना और आधी जली बैलगाड़ी

एक रात सुमन ने अपनी खिड़की से बाहर देखा तो उसका खून ही जम गया। जंगल के किनारे बैलगाड़ी खड़ी थी। उस पर बैठा था वह नरभक्षी छाया सिंह और वह सुमन को ही घूर रहा था। उसकी लाल आँखें सीधे सुमन पर ही टिकी हुई थीं और उसके होंठों पर एक भयानक मुस्कान थी।
सुमन चीख पड़ी। नरभक्षी खिड़की तोड़कर सुमन को उठाकर ले गया। जब तक रामप्रसाद भागकर आया, तब तक बैलगाड़ी गायब हो चुकी थी।
तभी रामप्रसाद ने रवि को बुलाया और उसे सारी बात बताई। अब रवि समझ चुका था कि छाया सिंह सिर्फ लोगों को ही नहीं मार रहा था, बल्कि उसकी नजर सुमन पर थी। शायद वह नरभक्षी सुमन को अपने साथ ले जाना चाहता था, क्योंकि पहले भी वह कई गाँव की सुंदर लड़कियों को ले जा चुका था। और सुमन को रवि किसी भी हालत में खो नहीं सकता था, चाहे उसे उस नरभक्षी से ही क्यों न लड़ना पड़े!
उस रात रवि ने फैसला किया कि वह इस डर का अंत करेगा।
वह कुल्हाड़ी और मशाल लेकर जंगल की ओर निकल पड़ा। रामप्रसाद भी उसके साथ गया। जंगल के अंदर जाते ही हवा अचानक बिल्कुल ठंडी हो गई। सारे पेड़ ऐसे हिल रहे थे जैसे उन पर कोई बैठा हो।
तभी दूर धुंध में बैलगाड़ी दिखाई दी। उसके पास सुमन खड़ी थी, जैसे उसे किसी ने अपने वश में कर लिया हो।
“सुमन… सुमन… वापस आओ!” रामप्रसाद जोर से चिल्लाया।
लेकिन सुमन उन्हें देख जरूर रही थी, मगर वह खुद के वश में नहीं थी। उसकी आँखें खाली थीं। वह धीरे-धीरे बैलगाड़ी के पीछे-पीछे चल रही थी। तभी नरभक्षी छाया सिंह हँस पड़ा। उसकी आवाज इंसान की बिल्कुल नहीं थी; ऐसा लग रहा था जैसे सौ लोग एक साथ चीख रहे हों।
तभी अचानक उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा और उसका चेहरा लंबा हो गया। दो दाँत बाहर निकल आए और उसकी आँखें आग की तरह जलने लगीं।
रामप्रसाद डर के मारे पीछे हट गया, लेकिन रवि कुल्हाड़ी लेकर सीधे उसकी तरफ दौड़ा। जैसे ही रवि ने वार किया, नरभक्षी हवा में गायब हो गया।
अगले ही पल रवि की चीख जंगल में गूँज उठी। रामप्रसाद ने पीछे मुड़कर देखा तो रवि हवा में लटका हुआ था, कोई अदृश्य शक्ति उसका गला दबा रही थी। रवि की चीख से थोड़ा सुमन को भी होश आ गया था। सुमन जोर-जोर से रोने लगी।
यह कहानी भी पढ़ें → गर्ल्स कॉलेज का खूनी रजिस्टर। पिशाज का अगला शिकार कौन? भाग 1 📖
तभी रामप्रसाद ने हनुमान चालीसा पढ़ते हुए मशाल उठाई और बैलगाड़ी पर फेंक दी। अचानक बैलगाड़ी आग में जल उठी। छाया सिंह दर्द से चीखने लगा।
उसकी चीख इतनी भयानक थी कि पूरा जंगल काँप उठा। पेड़ों पर बैठे सारे पक्षी एक साथ उड़ गए। उसी मौके का फायदा उठाकर रामप्रसाद अपनी बेटी सुमन का हाथ पकड़कर जोर से वहाँ से भागा। दोनों ही बिना पीछे देखे जंगल से बाहर भागते रहे।
मगर रवि ने हिम्मत नहीं हारी। तभी रवि ने नीचे गिरी हुई मशाल उठाई और पूरी ताकत से छाया सिंह नरभक्षी की बैलगाड़ी के अंदर फेंक दी।
देखते ही देखते सूखी लकड़ी की बैलगाड़ी आग पकड़ने लगी। आग की लपटें अचानक तेज होने लगीं और छाया सिंह के काले कपड़ों तक पहुँच गईं। नरभक्षी दर्द से ऐसी चीख मारने लगा मानो धरती भी फट जाएगी।
उसकी लाल आँखें और भी खतरनाक हो गईं। उसके चेहरे का आधा हिस्सा जल चुका था और काले धुएँ के साथ उसकी चमड़ी पिघलती हुई दिखाई दे रही थी।
तभी उसके दोनों बैल डरकर जोर-जोर से चिल्लाने लगे और पागलों की तरह जंगल की तरफ भागने लगे। जलती हुई बैलगाड़ी कीचड़ भरे रास्ते पर तेजी से दूर जाने लगी।
जाते-जाते नरभक्षी छाया सिंह ने पीछे मुड़कर रवि को घूरा और बोला, “मैं वापस आऊँगा… तुम सबको अपने साथ ले जाने!”
अगले ही पल बैलगाड़ी घनी धुंध के अंदर गायब हो गई। सिर्फ बैलों की घंटियों की आवाज दूर तक सुनाई दे रही थी—ठन-ठन-ठन।
रवि घायल था, लेकिन जिंदा बच गया था। रामप्रसाद ने रवि को जिंदा देखते ही गले से लगा लिया। रामप्रसाद व उसकी बेटी सुमन डर से अभी भी काँप रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि वह नरभक्षी छाया सिंह अभी मरा नहीं था।
उस घटना के बाद धुंधगाँव के लोगों ने हमेशा के लिए जंगल वाला रास्ता बिल्कुल बंद कर दिया था।
लेकिन आज भी बरसात और धुंध वाली रात में लोग कहते हैं कि दूर जंगल में एक आधी जली बैलगाड़ी दिखाई देती है, और उसमें बैठा दो लाल आँखों वाला अब भी अपने अगले शिकार का इंतजार कर रहा है…
अब गाँव में डर का माहौल और भी ज्यादा हो चुका था, क्योंकि किसी को भी नहीं पता था कि कब वह नरभक्षी छाया सिंह किसको अपना शिकार बनाएगा!
____कहानी समाप्त____




