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तुम मेरे थें पर किस्मत के नहीं । काश तुम मुझे मिल ही जाते ? Love Story In Hindi

तुम मेरे थें पर किस्मत के नहीं । काश तुम मुझे मिल ही जाते ? Love Story In Hindi। Hindirama.com

शिद्दत वाला सच्चा प्यार भी क्या अलग हो सकता है? क्या प्यार में भी किस्मत ही सब कुछ है?

यह संध्या और समीर की एक बेहद दर्दभरी और सच्ची प्रेम कहानी है, जिसमें गलतफहमी और किस्मत के खेल ने दो प्यार करने वालों को हमेशा के लिए अलग कर दिया।

वाकई में यह कहानी आपकी आँखों में सच्चे प्यार के आँसू जरूर ला देगी।   

काश तुम मुझे मिल ही जाते। Love Story In Hindi  

संध्या उस दिन पहली बार शहर आई थी। छोटे से गाँव की सीधी-सादी लड़की, जिसकी आँखों में बहुत सारे सपने थे। उसे नहीं पता था कि शहर की भीड़ में उसे कोई मिलने वाला है।

वह कॉलेज का पहला दिन था। संध्या घबराई हुई थी—नये लोग, नई जगह, नया माहौल। वह क्लास ढूँढ ही रही थी कि अचानक किसी से टकरा गई और उसकी किताबें नीचे गिर गईं।

“सॉरी, मैंने देखा नहीं,” किताबें उठाते हुए लड़के ने कहा। संध्या ने पहली बार समीर की तरफ देखा। यह उनकी पहली मुलाकात थी। एक टक्कर, और वहीं से एक कहानी शुरू हो गई।

हमारी पहली मुलाकात

तुम मेरे थें पर किस्मत के नहीं । काश तुम मुझे मिल ही जाते ? Love Story In Hindi। Hindirama.com

समीर ने मुस्कुराकर कहा, “आप नई आई हैं शायद?” संध्या बस हल्का सा मुस्कुरा दी। वह ज़्यादा बात करने वाली लड़की नहीं थी, लेकिन समीर की बातों में अलग सा अपनापन था।

धीरे-धीरे दोनों रोज़ मिलने लगे और बातें करने लगे। पहले “हेलो, कैसी हो?”, फिर साथ में कैंटीन जाना—सब बहुत धीरे-धीरे हो रहा था। पर दोनों को इंतज़ार रहने लगा था।

संध्या को अब कॉलेज अच्छा लगने लगा था। समीर भी दोस्तों के साथ कम, संध्या के साथ ज़्यादा दिखने लगा था। एक दिन समीर ने पूछा, “तुम इतनी चुप क्यों रहती हो?”

संध्या ने धीरे से कहा, “क्योंकि मुझे डर लगता है, लोग छोड़ के चले जाते हैं।” उस दिन के बाद से समीर ने उससे वादा किया कि वह उसे कभी छोड़कर नहीं जाएगा।

दोस्ती से सच्चे प्यार तक

यह सुनकर संध्या रो पड़ी। शायद उसे पहली बार किसी पर भरोसा हुआ था। अब दोनों घंटों फोन पर बात करते, साथ कॉलेज जाते और साथ ही वापस घर लौटते थे।

पूरे कॉलेज में सबको पता चल गया था कि ये दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं। लेकिन आज तक दोनों ने एक-दूसरे को अपने प्यार का इज़हार भी नहीं किया था।

एक दिन बारिश हो रही थी और कॉलेज जल्दी बंद हो गया। दोनों बस स्टॉप पर खड़े थे कि तेज़ बारिश होने लगी। समीर ने अपना बैग संध्या के सिर पर रख दिया।

संध्या ने कहा, “तुम भी तो भीग रहे हो।” समीर हँसकर बोला, “अगर तुम बीमार हो गई तो मुझे कौन देखेगा?” दोनों एक पेड़ के नीचे जाकर खड़े हो गए।

वो पहली बारिश और हमारा प्यार

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उस दिन बहुत तेज़ बारिश थी और संध्या ठंड से काँप रही थी। समीर ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा। संध्या ने हाथ नहीं छुड़ाया। समीर ने प्यार से उससे पूछा।

“संध्या, अगर मैं तुम्हारा हाथ ज़िंदगी भर पकड़ना चाहूँ, तो क्या तुम छोड़ोगी तो नहीं?” संध्या की आँखों में आँसू आ गए। उसने सिर हिलाकर मना किया—”नहीं”।

उस दिन पहली बार संध्या ने समीर के कंधे पर सिर रखा था। समीर ने महसूस किया कि यही लड़की उसकी ज़िंदगी है। दोनों अब छुप-छुपकर मिलने लगे थे।

कभी पार्क में, कभी लाइब्रेरी में, तो कभी मंदिर के पीछे। उनका प्यार बढ़ता जा रहा था और उन्हें दुनिया की कोई परवाह नहीं थी। उनका रिश्ता गहरा होता गया।

हम दोनों छुप-छुप कर ऐसे मिलने लगे

एक दिन समीर ने संध्या से कहा, “मेरे घर की हालत अच्छी नहीं है, मैं अमीर नहीं हूँ… पर तुम्हें बहुत खुश रखूँगा।” संध्या बोली, “मुझे पैसा नहीं, तुम चाहिए।”

लेकिन हर प्रेम कहानी में एक डर होता है—परिवार का। वही डर धीरे-धीरे सच बनने वाला था। एक दिन संध्या का भाई मोहन उसे कॉलेज छोड़ने के लिए आया।

उसने दूर से देख लिया कि संध्या एक लड़के से बात कर रही है, जो समीर था। उस दिन संध्या घर पहुंची, तो माहौल बदला हुआ था। पिता गुस्से में थे।

पिता कुर्सी पर बैठे थे, भाई गुस्से से लाल था और माँ रो रही थी। संध्या के पिता ने ज़ोर से पूछा, “कौन है वो लड़का?” संध्या पूरी तरह चुप रही।

हमारे घर में जब पता लगा ?

एक थप्पड़ की आवाज़ पूरे घर में गूँज गई। “आज के बाद कॉलेज बंद! उस लड़के से मिली, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।” संध्या पूरे समय बैठकर रोती रही।

उस दिन उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई। उसने अगले दिन समीर को फोन किया और सारी बात बता दी। समीर कुछ देर चुप रहा और फिर हिम्मत से बोला।

“डरो मत, मैं तुम्हारे पिता से बात करूँगा।” संध्या बहुत डर गई और बोली, “नहीं समीर, पापा बहुत गुस्से वाले हैं, वो तुम्हें मार देंगे।” लेकिन प्यार कहाँ डरता है।

अब आए हमारे प्यार के दुश्मन

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समीर सच में संध्या के घर चला गया और वही हुआ जिसका डर था। संध्या के पिता ने उसकी बहुत बेइज़्ज़ती की। “अपनी औकात देखी है? मेरी बेटी से शादी करेगा?”

“पहले अपने घर की हालत देख!” समीर सब कुछ चुपचाप सुनता रहा। उस दिन समीर बिना कुछ बोले वापस चला गया। उसने संध्या को फोन भी नहीं किया।

इधर संध्या सोचती रही—समीर ने फोन क्यों नहीं किया? क्या वह डर गया? क्या उसने मुझे छोड़ दिया? तीन दिन बीत जाने के बाद भी समीर का कोई फोन नहीं आया।

संध्या रो-रोकर बीमार हो गई। उसे लगा समीर उसे छोड़कर चला गया। उधर सच यह था कि समीर अपने पिता के साथ शहर छोड़कर काम करने चला गया था।

वह पैसे कमाकर फिर संध्या के पिता से बात करना चाहता था। लेकिन यह बात संध्या को नहीं पता थी। उसे सिर्फ इतना पता था कि समीर बिना बताए चला गया।

सबसे बड़ी गलतफहमी

यहीं से उनकी प्रेम कहानी में दर्द शुरू हो गया। संध्या तीन दिन से समीर के फोन का इंतज़ार कर रही थी। हर बार घंटी बजती, तो वह दौड़कर फोन उठाती।

लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती। उसकी आँखें रो-रोकर थक चुकी थीं। उसे बार-बार समीर की बात याद आ रही थी—”मैं तुम्हें कभी छोड़कर नहीं जाऊँगा।”

अब वही समीर बिना बताए चला गया था। संध्या को लगने लगा कि शायद समीर भी बाकी लोगों की तरह ही निकला। एक रात संध्या घर की छत पर बैठी थी।

हाथ में समीर की दी हुई छोटी सी रिंग थी, जो उसने मेले से खरीदी थी। कोई महँगी अंगूठी नहीं थी, मगर संध्या के लिए वह अंगूठी ही सब कुछ थी।

तुमने मुझपर भरोसा क्यों नहीं किया ?

संध्या रोते हुए बोली, “समीर, तुमने बोला था ना कि तुम कभी छोड़कर नहीं जाओगे?” उधर समीर शहर से बहुत दूर एक फैक्ट्री में दिन-रात मेहनत कर रहा था।

उसके हाथों में छाले पड़ गए थे, लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात थी—”मुझे पैसे कमाने हैं, मुझे संध्या के लायक बनना है।” समीर रोज़ फोन करने की कोशिश करता।

लेकिन संध्या के घरवाले अब उसका फोन उठाने ही नहीं देते थे। मोहन ने साफ़ मना कर दिया था—”अगर उस लड़के का फोन आया, तो कहना संध्या की शादी तय हो चुकी है।”

जब समीर ने यह बात सुनी, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने कई बार बात करने की कोशिश की, मगर हर बार वह उदास हुआ। समीर बहुत रोया।

अब हो गई मेरी शादी तय

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वह पूरी रात सड़क पर बैठा रहा। आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। वह बार-बार एक ही बात बोल रहा था—”संध्या ऐसा नहीं कर सकती… वो मुझे छोड़कर नहीं जा सकती।”

इधर संध्या के घर में उसकी शादी की बात चल रही थी। लड़का अमीर था—बड़ा घर, गाड़ी, पैसा सब था, बस प्यार नहीं था। संध्या ने माँ से मिन्नतें कीं।

संध्या ने रो-रोकर कहा, “माँ, मैं किसी और से शादी नहीं कर सकती…” माँ रोने लगी और बोली, “बेटी, बाप के आगे हमारी नहीं चलती।” संध्या असहाय महसूस कर रही थी।

संध्या ने आखिरी बार समीर को फोन करने की कोशिश की, लेकिन उसका फोन बंद आ रहा था। संध्या को लगा कि समीर सच में उसे छोड़कर जा चुका है।

तुम मुझे छोड़ कर क्यों चले गए ?

उसी रात संध्या ने अपनी डायरी में लिखा, “आज मेरा दिल टूटा है। जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा किया, उसने आज मुझे बिल्कुल अकेला छोड़ दिया।” वह टूट चुकी थी।

कुछ दिनों बाद समीर अचानक शहर वापस आया। वह सीधे संध्या के घर गया, लेकिन वहाँ जो देखा, उससे उसकी दुनिया खत्म हो गई। घर के बाहर लाइटें लगी थीं।

ढोल की आवाज़ आ रही थी। लोगों ने बताया कि घर में शादी है—संध्या की शादी। समीर वहीं सड़क पर खड़ा रहा। उसके हाथ से बैग ज़मीन पर गिर गया।

आँखों से लगातार आँसू गिर रहे थे। वह धीरे-धीरे मुड़ा और वापस चला गया। उसे भी वही लगा कि संध्या उसे भूल चुकी है और आगे बढ़ चुकी है।

मेरी शादी या मेरी मौत

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शादी वाले दिन संध्या दुल्हन बनी बैठी थी। लाल जोड़ा, हाथों में मेहंदी, आँखों में आँसू थे। बाहर सब खुश थे, लेकिन अंदर एक लड़की घुटकर मर रही थी।

जब पंडित जी ने कहा, “कन्या को बुलाइए,” तो संध्या धीरे-धीरे उठी। हर कदम पर उसे समीर याद आ रहा था। फेरों के समय संध्या मन ही मन बोल रही थी।

“समीर, अगर तुम आ जाओ ना… तो मैं यह शादी छोड़ दूँ… बस एक बार आ जाओ…” लेकिन समीर नहीं आया और संध्या किसी और की पत्नी बन गई।

सुहागरात की रात संध्या कमरे में बैठी थी। विक्रम कमरे में आया। उसने देखा कि संध्या रो रही है। विक्रम ने धीरे से पूछा, “क्या तुम किसी और से प्यार करती हो?”

सुहागरात पर बस तुम्हारा ही नाम याद आया

संध्या चौंक गई, “आपको कैसे पता?” विक्रम मुस्कुराया, “क्योंकि शादी की पूरी रस्मों में तुमने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा।” यह सुनकर संध्या ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

उसने किसी के सामने पहली बार स्वीकारा, “हाँ, मैं किसी और से प्यार करती हूँ और शायद मरते दम तक करती रहूँगी।” संध्या अपनी भावनाएँ रोक नहीं पाई।

विक्रम ने कहा, “संध्या, मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। मैं तुम्हें समय दूँगा। जब तक तुम मुझे अपना नहीं मानोगी, मैं तुम्हें छूऊँगा तक नहीं।” यह सुनकर वह और रोई।

उसे लगा कि वह एक अच्छे इंसान की ज़िंदगी भी बर्बाद कर रही है। उधर समीर ने शराब पीना शुरू कर दिया था। वह रात भर संध्या की फोटो देखता था।

मैं क्यों किसी और की पत्नी बन गई

वह हमेशा एक ही बात बोलता था, “संध्या, तुम खुश तो हो ना? अगर तुम खुश हो, तो मैं सब सह लूँगा…” समय अपनी गति से बीतता चला गया।

पाँच साल बीत गए। एक दिन संध्या अस्पताल गई थी—अपनी माँ का चेकअप कराने। अचानक उसने सामने एक आदमी को देखा। वह आदमी समीर ही था।

वह बहुत बदल चुका था—दाढ़ी, थका हुआ चेहरा, उदास आँखें। लेकिन संध्या उसे एक नज़र में पहचान गई। दोनों एक-दूसरे को चुपचाप देखते रह गए।

पाँच साल का दर्द, प्यार, शिकायत—सब आँखों में था, लेकिन शब्द नहीं थे। आख़िर समीर ने पूछा, “खुश हो?” संध्या की आँखों से आँसू गिर पड़े।

इतने सालों बाद हम फिर मिले

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संध्या बोली, “तुम्हारे बिना कोई खुश रह सकता है क्या?” दोनों अस्पताल के पीछे जाकर बैठ गए। दोनों रो रहे थे, जैसे पाँच साल का दर्द बाहर आ रहा हो।

संध्या ने रोते हुए कहा, “तुम मुझे छोड़कर क्यों चले गए थे?” समीर चौंक गया, “मैं तुम्हारे लिए पैसे कमाने गया था… तुम्हारे पापा से बात करने…”

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अब चौंकने की बारी संध्या की थी। “मुझे कहा गया था कि तुम भाग गए… मुझे छोड़कर!” दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए। एक गलतफहमी ने ज़िंदगी बर्बाद कर दी।

समीर ने कहा, “अगर हम उस दिन एक बार मिल लेते, तो शायद आज सब कुछ अलग होता…” संध्या रोते हुए बोली, “हम मिले थे समीर, लेकिन किस्मत नहीं मिली।”

हम दोनों फिर से इतना रोए

समीर ने जेब से वही पुरानी रिंग निकाली—”मैंने संभालकर रखी है।” संध्या ने अपनी चेन से वही रिंग निकाली—”मैंने भी…” दोनों बिलख-बिलख कर रो पड़े।

संध्या ने कहा, “अब मैं किसी और की पत्नी बन गई हूँ। और तुम… तुम अब भी मेरे हो… लेकिन हम एक-दूसरे के नहीं हो सकते।” उनका दिल तड़प उठा।

समीर मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोला, “प्यार हमेशा शादी से नहीं मिलता… कभी-कभी यादों में भी पूरा जीवन गुज़र जाता है।” संध्या जाने लगी, फिर वापस आई।

संध्या ने समीर को गले लगा लिया। दोनों बहुत देर तक रोते रहे। यह उनकी आखिरी मुलाकात थी। कुछ प्यार पूरे नहीं होते, लेकिन कभी खत्म भी नहीं होते।

तुम मेरे थे, पर किस्मत के नहीं

समीर ने कभी शादी नहीं की। संध्या ने अपना फर्ज़ निभाया, लेकिन दिल में हमेशा समीर ही रहा। दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी जीते रहे, पर दिल में एक ही नाम था।

समीर और संध्या सच्चे प्यार की मिसाल बन चुके थे। “आज भी मैं तुमसे प्यार करती हूँ… समीर,” एक दिन संध्या ने अपनी डायरी में यह लिखा।

उसने आगे लिखा कि अगर समीर अगले जन्म में आएगा, तो वह सिर्फ उसकी बनकर आएगी। क्योंकि इस जन्म में वह उसका तो था, पर किस्मत में नहीं था।

इस कहानी से सीख

सच्चा प्यार कभी खत्म नहीं होता, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विषम क्यों न हों। जीवन में कभी भी बिना पूरी सच्चाई जाने या आपस में बात किए कोई बड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए, क्योंकि एक छोटी सी गलतफहमी दो जिंदगियों को हमेशा के लिए बदल सकती है।

____कहानी समाप्त____

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