यह कहानी उस प्यार की है, जो शादी के बंधन तक नहीं पहुँच सका, लेकिन दो दिलों से कभी अलग भी नहीं हुआ। अधूरी मोहब्बत की कहानी अभिषेक और मायरा के उस गहरे प्यार की दास्तान है, जिसे किस्मत ने साथ रहने का मौका नहीं दिया।
बिछड़ने के बाद भी दोनों की यादें, मुलाकातें और दोस्ती उनके दिलों में पुराने प्यार को जिंदा रखती रहीं। यह कहानी प्यार, परिवार की मजबूरी, त्याग, दूरी और उन भावनाओं की है, जिन्हें समय भी खत्म नहीं कर सका।
ऑफिस में हुई थी अभिषेक और मायरा की पहली मुलाकात। Love Story In Hindi
दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में मायरा मार्केटिंग टीम की सीनियर थी। उम्र लगभग छब्बीस साल थी। वह हमेशा साड़ी पहनकर ऑफिस आती थी और उसके शांत चेहरे पर एक अलग ही गंभीरता रहती थी।
ऑफिस में बहुत से लोग उसे पसंद करते थे, लेकिन मायरा किसी को अपने करीब आने नहीं देती थी। वह कम बोलती थी और अपने काम से काम रखती थी। किसी लड़के का हाथ गलती से भी उसे छू जाता तो उसकी आँखों में तुरंत नाराजगी दिखाई देने लगती थी।
उसी ऑफिस में चौबीस साल का अभिषेक तीन महीने पहले ही आया था। वह शांत स्वभाव का था। शुरुआत में उसका और मायरा का रिश्ता सिर्फ काम तक सीमित था। सुबह वह मुस्कुराकर कहता, “गुड मॉर्निंग मैम।”
मायरा भी हल्की-सी मुस्कान के साथ जवाब देती और फिर अपने काम में लग जाती। दोनों को तब बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यही छोटी-सी मुस्कान आगे चलकर उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी याद बनने वाली है।
काम के बहाने करीब आने लगे दोनों
एक दिन मायरा एक जरूरी एक्सेल शीट तैयार कर रही थी, लेकिन बार-बार फॉर्मूला गलत हो रहा था। वह काफी देर से स्क्रीन देख रही थी। अभिषेक ने दूर से देखा, लेकिन बिना किसी दिखावे के अपनी कुर्सी से उठा और उसके पास आ गया।
“मैम, अगर आप चाहें तो मैं देख दूँ?”
मायरा ने पहली बार उसे ध्यान से देखा और चुपचाप कुर्सी छोड़ दी। अभिषेक ने कुछ ही मिनट में शीट ठीक कर दी। मायरा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
“थैंक यू, अभिषेक।”
वह दो शब्द अभिषेक के लिए उस दिन की सबसे खूबसूरत चीज बन गए। उसे पहली बार लगा कि मायरा के चेहरे पर दिखाई देने वाली सख्ती के पीछे एक बहुत नरम दिल भी छिपा है।
कुछ दिनों बाद अभिषेक को एक बड़े क्लाइंट के सामने प्रेजेंटेशन देना था। वह घबरा रहा था। मायरा ने उसकी परेशानी समझ ली और ऑफिस खत्म होने के बाद भी उसके साथ बैठी रही। रात के करीब आठ बज चुके थे।
“ऐसे नहीं, अभिषेक। क्लाइंट के सामने पहले उनकी जरूरत समझो, फिर अपना समाधान बताओ।”
अभिषेक उसकी बात सुनता रहा। उस रात दोनों पहली बार काम से आगे की बातें करने लगे। पसंद, परिवार, शहर, सपने और जिंदगी के छोटे-छोटे किस्से उनके बीच आने लगे।
टेबल के नीचे शुरू हुआ उनका अनकहा प्यार
एक दिन टीम की मीटिंग थी। दोनों एक-दूसरे के सामने बैठे थे। कमरे में बाकी लोग अपने-अपने काम की बातें कर रहे थे। तभी अभिषेक का पैर हल्के से मायरा के पैर से छू गया।
मायरा अचानक चौंकी। उसने नीचे देखा और फिर अभिषेक की तरफ देखा। अभिषेक ने तुरंत पैर पीछे करने की कोशिश की, लेकिन मायरा ने उसे रोक दिया। उसके चेहरे पर नाराजगी नहीं थी।
उस दिन पहली बार दोनों को समझ आया कि उनका रिश्ता शब्दों से बहुत आगे निकल चुका है।
इसके बाद टेबल के नीचे उनकी छोटी-सी दुनिया बन गई। कभी अभिषेक उसका हाथ पकड़ लेता और मायरा धीरे से उसकी उंगलियाँ दबा देती। कभी मायरा अपना हाथ उसके हाथ के पास रख देती। दोनों जानते थे कि यह रिश्ता किसी को दिखाई नहीं देना चाहिए, फिर भी उनके लिए वही कुछ सेकंड पूरे दिन का सुकून बन जाते थे।
मायरा, जो किसी के छूने से भी परेशान हो जाती थी, अभिषेक के स्पर्श में खुद को सुरक्षित महसूस करने लगी थी।
ऑफिस से निकलते ही एक हग उनके लिए जरूरी हो गया
धीरे-धीरे दोनों का रिश्ता इतना गहरा हो गया कि ऑफिस की छुट्टी के बाद कुछ पल साथ बिताए बिना उन्हें लगता ही नहीं था कि दिन पूरा हुआ है।
कभी ऑफिस की सीढ़ियों के पास, कभी पार्किंग के शांत कोने में और कभी किसी खाली कॉरिडोर में दोनों कुछ पल अकेले खड़े हो जाते। मायरा आसपास देखती और फिर अभिषेक के करीब आ जाती।
एक दिन मायरा ने धीमी आवाज में कहा, “आज बहुत थक गई हूँ।”
अभिषेक ने कुछ नहीं कहा। उसने बस उसे अपनी बाँहों में ले लिया। मायरा ने आँखें बंद कर लीं। कुछ सेकंड तक दोनों वैसे ही खड़े रहे।
उनके लिए वह हग सिर्फ प्यार नहीं था, बल्कि पूरे दिन की थकान और दुनिया की सारी परेशानियों से कुछ पल की राहत था।
ऐसे ही उनकी कई छोटी-छोटी मुलाकातों में लगभग दस बार ऐसे भावुक हग हुए, जिन्हें दोनों ने अपने दिल में हमेशा के लिए संभाल लिया। हर बार मायरा कुछ पल के लिए अभिषेक के सीने से लगती और हर बार उसे लगता कि काश समय यहीं रुक जाए।
मायरा के माथे पर अभिषेक का वह प्यार
अभिषेक का प्यार कभी दिखावे वाला नहीं था। वह मायरा की बहुत इज्जत करता था। जब भी मायरा किसी परेशानी में होती, वह उसे समझाता और फिर प्यार से उसके माथे पर हल्की-सी किस कर देता।
एक शाम मायरा अपने परिवार को लेकर परेशान थी। अभिषेक ने उसकी आँखों में आँसू देखे और धीरे से कहा, “रो मत। मैं हूँ तुम्हारे साथ।” फिर उसने उसके माथे पर प्यार से किस किया।
मायरा ने आँखें बंद कर लीं। उसके चेहरे पर आँसू थे, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
मायरा के लिए अभिषेक का माथे पर किया गया वह छोटा-सा प्यार किसी वादे से कम नहीं था।
ऐसे ही अलग-अलग मौकों पर अभिषेक ने उसके माथे पर पाँच से छह बार प्यार से किस किया। हर बार मायरा की आँखें नम हुईं और हर बार उसने मन ही मन यही चाहा कि यह रिश्ता कभी खत्म न हो।
लेकिन दोनों के बीच सिर्फ प्यार नहीं, परिवार भी था
अभिषेक और मायरा एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे, लेकिन दोनों जानते थे कि जिंदगी सिर्फ दो लोगों के फैसले से नहीं चलती। मायरा उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ की रहने वाली थी, जो प्रयागराज के पास है। उसका परिवार अपनी परंपराओं और रिश्तों को बहुत महत्व देता था।
मायरा के माता-पिता पहले ही अमन के परिवार को अपनी बेटी की शादी का वचन दे चुके थे। अमन आर्थिक रूप से अच्छा था और विदेश में रहता था। परिवार को लगता था कि मायरा के लिए इससे अच्छा रिश्ता शायद ही मिले।
दूसरी तरफ अभिषेक राजस्थान का रहने वाला था। उसका परिवार अलग सामाजिक और जातीय पृष्ठभूमि से था। मायरा जानती थी कि उसके माता-पिता इस रिश्ते को आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे।
वह अपने माता-पिता से बहुत प्यार करती थी। वह उन्हें दुख देकर अपनी जिंदगी शुरू नहीं करना चाहती थी। उसे डर था कि अगर उसने अपने प्यार के लिए परिवार के खिलाफ कदम उठाया तो उसके माता-पिता जिंदगी भर खुद को दोष देते रहेंगे।
मायरा के सामने सवाल यह नहीं था कि वह अभिषेक से प्यार करती है या नहीं; सवाल यह था कि क्या वह अपने माता-पिता की खुशी कुचलकर अपना प्यार चुन सकती है?
और अभिषेक इतना प्यार करता था कि वह मायरा को उस फैसले के लिए मजबूर नहीं करना चाहता था।
एक रात दोनों ने रोते-रोते पूरी रात फोन पर बात की
जब मायरा की शादी की बात पक्की होने लगी तो दोनों की दुनिया जैसे धीरे-धीरे टूटने लगी। एक रात मायरा ने अभिषेक को फोन किया। फोन उठते ही वह कुछ बोल नहीं पाई। दूसरी तरफ अभिषेक भी चुप था।
कुछ देर बाद मायरा की सिसकी सुनाई दी।
“अभिषेक… मैं क्या करूँ?”
अभिषेक की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने खुद को संभालते हुए कहा, “जो तुम्हारे माता-पिता की इज्जत बचाए, वही करना।”
“लेकिन मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूँगी?”
अभिषेक कुछ सेकंड चुप रहा। फिर बोला, “मुझे नहीं पता। शायद मैं भी नहीं रह पाऊँगा… लेकिन तुम्हें तो जीना होगा।”
उस रात फोन नहीं कटा। दोनों कभी रोते, कभी चुप रहते और कभी पुरानी बातें याद करके मुस्कुराने की कोशिश करते। सुबह होने लगी, लेकिन दोनों की आँखों में नींद नहीं थी।
उस रात दोनों ने समझ लिया था कि प्यार बचा रहेगा, लेकिन शायद उनका साथ नहीं बच पाएगा।
एक ऐसा वादा, जिसने मायरा को अभिषेक का बना दिया
शादी से कुछ समय पहले दोनों ने एक दिन मंदिर में मिलने का फैसला किया। वहाँ कोई बड़ा समारोह नहीं था। बस दोनों थे और उनके दिल में एक-दूसरे के लिए पूरा विश्वास था।
मायरा ने अभिषेक की तरफ देखते हुए कहा, “अगर हमारी शादी नहीं हुई तो क्या तुम मुझे भूल जाओगे?”
अभिषेक की आँखें भर आईं। उसने सिर हिलाकर कहा, “तुम्हें भूलना मेरे बस में नहीं है।”
उस पल अभिषेक ने बहुत भावुक होकर मायरा की मांग में सिंदूर भरा और उसके गले में मंगलसूत्र बाँध दिया। यह किसी कानूनी विवाह का दावा नहीं था, बल्कि उन दोनों के बीच किया गया एक निजी और भावनात्मक वादा था।
मायरा रोते हुए उसके सीने से लग गई। अभिषेक ने उसे कसकर हग किया और उसके माथे पर प्यार से किस किया।
उस दिन दोनों ने मन से एक-दूसरे को अपना जीवनसाथी मान लिया था, लेकिन किस्मत ने उनके नाम के आगे पति-पत्नी लिखना स्वीकार नहीं किया।
शादी के दिन भी मायरा की आँखें अभिषेक को खोज रही थीं
आखिर वह दिन आ गया जब मायरा की शादी अमन से होने वाली थी। घर में खुशियाँ थीं। रिश्तेदार थे। सजावट थी। हर तरफ शादी की तैयारियाँ थीं। लेकिन मायरा के भीतर एक ऐसी खामोशी थी जिसे कोई नहीं देख पा रहा था।
अभिषेक भी शादी में पहुँचा। वह दूर खड़ा रहा। लाल जोड़े में बैठी मायरा बहुत खूबसूरत लग रही थी। लेकिन उसकी आँखें बार-बार भीड़ में किसी को खोज रही थीं।
जब उसकी नजर अभिषेक पर पड़ी तो दोनों की आँखें भर आईं। कोई शब्द नहीं निकला। फिर भी दोनों ने एक-दूसरे से बहुत कुछ कह दिया।
मायरा ने मन ही मन कहा, “मुझे माफ कर देना।”
अभिषेक ने आँखों से जवाब दिया, “तुम्हारी कोई गलती नहीं है।”
शादी हो गई। मायरा अमन के साथ चली गई। अभिषेक वहीं खड़ा रहा और उसे जाते हुए देखता रहा।
स्टेशन वाली आखिरी मुलाकात ने दोनों को फिर आमने-सामने ला दिया
शादी के करीब चार महीने बाद अभिषेक मुंबई जाने के लिए ट्रेन पकड़ने स्टेशन पहुँचा। प्लेटफॉर्म पर भीड़ थी। लोग अपने सामान के साथ इधर-उधर जा रहे थे। तभी उसकी नजर सामने वाले प्लेटफॉर्म पर पड़ी।
वहाँ मायरा खड़ी थी। लाल साड़ी, मांग में सिंदूर, हाथों में चूड़ियाँ और पैरों में पायल। अभिषेक के कदम वहीं रुक गए।
मायरा की नजर भी उस पर पड़ गई। कुछ पल के लिए दोनों जैसे दुनिया से कट गए। वे धीरे-धीरे एक-दूसरे के पास आए।
अभिषेक ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“कैसी हो? शादी मुबारक हो।”
मायरा ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखें सब बता रही थीं।
अभिषेक की नजर उसके सिंदूर, चूड़ियों और पायल पर गई। उसने नजरें झुका लीं। उसकी आँखों से आँसू निकल आए।
उसने मन ही मन सोचा—जिसे वह कभी अपनी पत्नी कहता था, आज वही किसी और की पत्नी बनकर उसके सामने खड़ी थी।
मायरा ने धीमे से कहा, “अभिषेक, मैं आज भी…”
लेकिन आगे के शब्द उसके गले में ही अटक गए। तभी पीछे से अमन की आवाज आई, “मायरा, चलें? ट्रेन आ गई है।”
मायरा ने अभिषेक को आखिरी बार देखा। उसकी आँखें जैसे कह रही थीं कि उसके दिल में जो था, वह आज भी वहीं है।
फिर वह अमन के साथ चली गई। ट्रेन चल पड़ी। मायरा की पायल की आवाज धीरे-धीरे दूर होती गई।
प्यार खत्म नहीं हुआ, बस उसका नाम बदल गया
स्टेशन वाली आखिरी मुलाकात के बाद अभिषेक ने खुद को काम में झोंक दिया। उसने नौकरी छोड़कर अपना टूर एंड ट्रैवल बिजनेस शुरू किया। धीरे-धीरे उसका कारोबार बढ़ने लगा। वह भारत के अलग-अलग शहरों के साथ विदेश यात्रा के पैकेज भी देने लगा।
एक दिन उसके बिजनेस की वेबसाइट पर मायरा की नजर पड़ी। उसने बहुत देर तक स्क्रीन देखी। फिर उसने एक ट्रैवल पैकेज बुक किया।
कुछ दिनों बाद अभिषेक को अपनी कंपनी की प्राइम मेंबर लिस्ट में मायरा का नाम दिखाई दिया। उसका दिल एक पल के लिए रुक-सा गया।
मायरा ने उससे कोई पुराना रिश्ता माँगा नहीं था। उसने सिर्फ इतना कहा, “अब हम दोस्त बनकर मिल सकते हैं ना?”
अभिषेक ने जवाब दिया, “हाँ। अगर दोस्ती से तुम्हें सुकून मिलता है, तो मैं हमेशा तुम्हारा दोस्त रहूँगा।”
दोनों ने अपने प्यार को पाने की कोशिश छोड़ दी, लेकिन एक-दूसरे को खोने की कोशिश कभी नहीं की।
भारत और विदेश की यात्राएँ, जिनमें छिपा था पुराना प्यार
अब मायरा कभी अभिषेक की कंपनी के साथ जयपुर जाती, कभी गोवा, कभी कश्मीर और कभी किसी विदेशी शहर की यात्रा पर। बाकी लोगों के लिए वह सिर्फ कंपनी की एक प्राइम मेंबर थी और अभिषेक सिर्फ उसका ट्रैवल कंसल्टेंट और दोस्त।
लेकिन उनके लिए हर यात्रा के पीछे एक छोटी-सी खुशी छिपी थी—कुछ समय साथ बिताने की खुशी।
वे कभी किसी कैफे में बैठकर चाय पीते। कभी किसी पहाड़ी रास्ते पर चलते हुए पुरानी बातें याद करते। कभी घंटों बात करते और कभी दोनों चुपचाप बैठे रहते।
अभिषेक अब मायरा को पहले की तरह अपने पास खींच नहीं सकता था। मायरा भी अब उसकी जिंदगी में वही जगह नहीं ले सकती थी। दोनों अपनी सीमाएँ समझते थे।
अब उन्हें एक-दूसरे का होना नहीं था, बस एक-दूसरे से मिल लेना ही उनके लिए बहुत था।
कभी किसी यात्रा के अंत में मायरा बस इतना कहती, “आज अच्छा लगा।”
अभिषेक मुस्कुराकर कहता, “मुझे भी।”
दोनों जानते थे कि इन दो शब्दों के पीछे कितनी सारी अधूरी बातें छिपी हैं।
अमन को कुछ पता नहीं था, लेकिन अभिषेक ने कभी उसकी जगह छीनने की कोशिश नहीं की
अमन को अभिषेक और मायरा के पुराने रिश्ते की गहराई के बारे में कुछ पता नहीं था। मायरा ने अपनी जिंदगी में जो जिम्मेदारियाँ स्वीकार की थीं, उन्हें वह निभा रही थी। अभिषेक भी जानता था कि किसी की जिंदगी को तोड़कर अपना प्यार वापस पाना सही रास्ता नहीं होगा।
इसलिए उसने कभी मायरा से यह नहीं कहा कि वह अपना घर छोड़ दे। उसने कभी उसे अपने साथ भागने के लिए नहीं कहा। उसने बस उसकी दोस्ती स्वीकार की और उसके सुख-दुख में एक दोस्त की तरह मौजूद रहा।
अभिषेक का प्यार अब अधिकार नहीं था; वह मायरा की जिंदगी के लिए एक शांत दुआ बन चुका था।
रात में फिर वही पुरानी आवाजें फोन पर लौट आती थीं
कभी-कभी रात बहुत लंबी हो जाती। मायरा अपने कमरे में बैठकर पुराने दिनों को याद करती। उसे ऑफिस की वह टेबल याद आती, जहाँ दोनों चुपचाप एक-दूसरे का हाथ पकड़ते थे। उसे वह कॉरिडोर याद आता, जहाँ ऑफिस से निकलने से पहले दोनों कुछ पल एक-दूसरे को हग करते थे।
कभी वह अभिषेक को फोन कर देती।
“सो गए थे?”
“नहीं।”
“मुझे आज ऑफिस याद आ रहा था।”
अभिषेक कुछ देर चुप रहता। फिर कहता, “मुझे भी।”
कभी दोनों रोते हुए फोन पर बात करते और फिर खुद को समझाते कि उन्हें आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन कुछ यादें ऐसी थीं जिन्हें आगे बढ़ने के बाद भी पीछे छोड़ना संभव नहीं था।
उनके बीच अब दूरी थी, जिम्मेदारियाँ थीं और अलग-अलग जिंदगी थी, लेकिन यादों के रास्ते पर दोनों आज भी साथ चलते थे।
अभिषेक के पास मायरा की यादें थीं, मायरा के पास उसका पुराना प्यार
अभिषेक ने अपने ऑफिस की एक दराज में कुछ पुरानी चीजें संभालकर रखी थीं। मायरा की लिखावट वाला एक छोटा-सा नोट, एक पुरानी फोटो और एक कागज जिस पर मायरा ने कभी काम की जल्दी में कुछ लिख दिया था।
वह उन चीजों को रोज नहीं देखता था। लेकिन जब कभी जिंदगी बहुत भारी लगती, वह दराज खोलता और कुछ देर चुपचाप बैठा रहता।
मायरा के पास भी पुरानी यादें थीं। कभी उसे अभिषेक की वह आवाज याद आती, “चिंता मत करो, मैं हूँ।” कभी माथे पर किया गया वह प्यार याद आता और कभी वह दिन जब दोनों ने एक-दूसरे को अपना जीवनसाथी मानकर एक वादा किया था।
लेकिन अब दोनों समझ चुके थे कि जिंदगी में हर सच्चा प्यार अपने मुकाम तक नहीं पहुँचता। कुछ प्यार बस इंसान के भीतर हमेशा के लिए रह जाते हैं।
एक दिन मायरा ने अभिषेक से सिर्फ इतना कहा—हम मिलते रहेंगे ना?
एक यात्रा से लौटते समय दोनों एयरपोर्ट के पास एक शांत कैफे में बैठे थे। बाहर बारिश हो रही थी। मायरा काफी देर से खिड़की के बाहर देख रही थी।
फिर उसने अभिषेक की तरफ देखा।
“अभिषेक, एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“हम ऐसे ही दोस्त बनकर मिलते रहेंगे ना?”
अभिषेक ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में वही पुरानी मायरा थी, लेकिन जिंदगी बहुत बदल चुकी थी।
उसने मुस्कुराकर कहा, “जब तक तुम्हें यह दोस्ती सुकून देती है, मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
मायरा की आँखों से आँसू निकल आए। उसने बस सिर हिलाया।
उन्हें अब जिंदगी साथ नहीं बितानी थी, बस जिंदगी के बीच-बीच में एक-दूसरे से मिलकर यह याद करना था कि उनका प्यार कभी झूठा नहीं था।
उनका प्यार अधूरा था, लेकिन बेकार नहीं
समय गुजरता गया। अभिषेक का बिजनेस और बड़ा होता गया। मायरा अपनी जिंदगी में आगे बढ़ती रही। दोनों की मुलाकातें कम-ज्यादा होती रहीं, लेकिन जब भी मिलते, पुराने दिनों की कोई न कोई याद उनके बीच जरूर आ जाती।
कभी मायरा मुस्कुराकर कहती, “याद है, तुम मेरी एक्सेल शीट ठीक करते थे?”
अभिषेक हँसकर कहता, “और तुम मुझे गुड मॉर्निंग भी ठीक से नहीं बोलती थीं।”
दोनों हँसते। फिर अचानक कुछ सेकंड के लिए चुप हो जाते। क्योंकि दोनों जानते थे कि उस हँसी के पीछे एक पूरी जिंदगी छिपी हुई है।
मायरा अपने माता-पिता की इज्जत बचाने के लिए अपने फैसले के साथ जी रही थी। अभिषेक उसके फैसले की इज्जत करते हुए उसके जीवन से पूरी तरह गायब होने के बजाय एक सच्चा दोस्त बनकर रह गया था।
कभी-कभी सच्चा प्यार किसी को अपना बना लेने में नहीं, बल्कि उसकी खुशी के लिए उसे जाने देने में भी दिखाई देता है।
और शायद किसी दूसरी जिंदगी में उनकी कहानी पूरी होगी
एक रात अभिषेक अपने ऑफिस की खिड़की के पास खड़ा था। शहर की रोशनी दूर तक दिखाई दे रही थी। उसे अचानक वही पुराना स्टेशन याद आ गया, जहाँ उसने मायरा को आखिरी बार दुल्हन के रूप में देखा था।
उसे उसकी लाल साड़ी याद आई। मांग का सिंदूर याद आया। पायल की आवाज याद आई। और सबसे ज्यादा वह पल याद आया जब दोनों एक-दूसरे को देखते हुए भी कुछ कह नहीं पाए थे।
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उधर मायरा भी कभी-कभी उसी अतीत की खिड़की खोल देती थी। उसे लगता था कि जिंदगी ने उसे बहुत कुछ दिया, लेकिन एक कहानी अधूरी छोड़ दी।
शायद यही उनके प्यार की सबसे बड़ी सच्चाई थी—वे एक-दूसरे को पा नहीं सके, लेकिन एक-दूसरे के दिल से कभी निकल भी नहीं पाए।
शायद अगली जिंदगी में न कोई जाति होगी, न परिवार की मजबूरी, न कोई अधूरा वादा—सिर्फ अभिषेक होगा, मायरा होगी और उनका पूरा हो चुका प्यार होगा।
लेकिन इस जिंदगी में उनकी कहानी ऐसी ही रही—एक ऐसा प्यार जो शादी से पहले पूरा महसूस हुआ, शादी के बाद यादों में जिंदा रहा और समय के साथ एक ऐसी दोस्ती में बदल गया, जिसमें दोनों को बस एक-दूसरे की मौजूदगी का सुकून चाहिए था।
क्योंकि कुछ रिश्तों का अंत साथ रहने से नहीं होता। कुछ रिश्ते दूर जाकर भी दिल के सबसे करीब बने रहते हैं।
अभिषेक और मायरा की कहानी भी ऐसी ही थी—प्यार मिला, मगर साथ नहीं मिला; रिश्ता टूटा, मगर प्यार कभी नहीं टूटा।




