बंदर और लकड़ी का खूंटा पंचतंत्र की एक प्रसिद्ध कहानी है। इसमें एक शरारती बंदर बढ़ई के काम को देखकर उत्सुक हो जाता है और लकड़ी में फँसे खूंटे को निकालने लगता है। उसे लगता है कि वह एक छोटा-सा काम कर रहा है, लेकिन उसकी यही गलती उसे मुसीबत में डाल देती है। यह कहानी हमें समझाती है कि बिना सोचे-समझे किसी काम में हाथ डालना कितना नुकसानदायक हो सकता है।
बंदर और लकड़ी का खूंटा
एक गाँव के पास एक बढ़ई अपनी छोटी-सी कार्यशाला में लकड़ी का काम करता था। वह लकड़ी से दरवाजे, खिड़कियाँ और घर में इस्तेमाल होने वाली दूसरी चीजें बनाता था। उसकी कार्यशाला के आसपास कई पेड़ थे, जिन पर बंदरों का एक झुंड रहता था। बंदर अक्सर वहाँ आते, पेड़ों पर उछलते-कूदते और फिर वापस जंगल में चले जाते थे।
एक दिन बढ़ई लकड़ी के एक मोटे तने को बीच से चीर रहा था। उसने तने में गहरी दरार बनाई और उसके बीच एक लकड़ी का खूंटा फँसा दिया, ताकि लकड़ी के दोनों हिस्से अलग रहें। इससे उसे लकड़ी चीरने में आसानी हो रही थी। वह ध्यान लगाकर अपना काम कर रहा था।
कुछ देर बाद बढ़ई को किसी जरूरी काम से बाहर जाना पड़ा। उसने अपने औजार एक तरफ रखे और लकड़ी को वहीं छोड़कर चला गया। उसे उम्मीद थी कि लौटने पर वह अपना काम पूरा कर लेगा। बढ़ई के जाते ही आसपास फिर से शांति छा गई।
शरारती बंदर की नजर खूंटे पर पड़ी
थोड़ी देर बाद बंदरों का झुंड वहाँ आ पहुँचा। सभी बंदर इधर-उधर उछलने लगे। कोई पेड़ की डाल पर बैठा था, तो कोई जमीन पर पड़ी चीजों को देख रहा था। उन्हीं में एक बंदर था, जिसे हर नई चीज के साथ छेड़छाड़ करने की आदत थी। वह बिना सोचे ही कोई न कोई शरारत कर बैठता था।
घूमते-घूमते उसकी नजर लकड़ी के तने पर पड़ी। वह उसके पास गया और बीच में फँसे खूंटे को देखने लगा। उसने पहले उसे हाथ लगाया, फिर धीरे-धीरे हिलाया। खूंटा थोड़ा-सा हिला, तो बंदर को लगा कि इसे बाहर निकालना बहुत आसान होगा।
बंदर ने सोचा, “यह लकड़ी का टुकड़ा यहाँ क्यों फँसा है? इसे निकाल देता हूँ।” उसे यह नहीं पता था कि बढ़ई ने उस खूंटे को किसी खास काम के लिए लगाया था। उसने न तो यह समझने की कोशिश की कि खूंटा क्यों लगा है और न ही वहाँ से दूर जाने के बारे में सोचा। वह बस उसे निकालने की जिद पकड़कर बैठ गया।
बंदर ने बिना सोचे-समझे खींचा खूंटा
बंदर ने खूंटे को दोनों हाथों से पकड़कर खींचना शुरू किया। पहले उसने धीरे-धीरे जोर लगाया, लेकिन खूंटा बाहर नहीं निकला। उसने फिर कोशिश की। इस बार वह और जोर से खींचने लगा। कुछ देर तक कोशिश करने के बाद भी जब खूंटा नहीं निकला, तो वह चिढ़ गया।
अब बंदर ने मन में ठान लिया कि वह खूंटा निकालकर ही रहेगा। उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी। आखिरकार खूंटा अचानक बाहर निकल आया। बंदर को लगा कि उसने बहुत बड़ा काम कर लिया है, लेकिन अगले ही पल उसकी खुशी परेशानी में बदल गई।
खूंटा निकलते ही लकड़ी के दोनों हिस्से एक-दूसरे के पास आ गए। बंदर उनके बीच फँस गया और दर्द से चिल्लाने लगा। वह घबराकर खुद को छुड़ाने की कोशिश करने लगा। जितना वह छटपटाता, उतना ही परेशान होता जाता। अब उसे समझ आया कि जिस चीज को वह बेकार समझ रहा था, वह वास्तव में लकड़ी को अलग रखने के लिए लगाई गई थी।
अपनी गलती पर पछताया बंदर
बंदर जोर-जोर से चिल्लाया, तो बाकी बंदर भी उसके पास आ गए। उन्होंने उसे फँसा हुआ देखा, लेकिन वे उसकी मदद नहीं कर सके। शरारती बंदर अब बहुत डर गया था। उसे याद आया कि अगर वह खूंटे को छेड़ता ही नहीं, तो उसके साथ ऐसा नहीं होता। उसकी छोटी-सी जिज्ञासा और जिद ने उसे बड़ी मुसीबत में डाल दिया था।
कुछ समय बाद बढ़ई वापस लौटा। उसने बंदर को लकड़ी के पास फँसा देखा, तो तुरंत उसकी मदद करने लगा। उसने सावधानी से लकड़ी के दोनों हिस्सों को अलग किया और बंदर को बाहर निकलने का मौका दिया। थोड़ी कोशिश के बाद बंदर आजाद हो गया। वह डरा हुआ था और बिना पीछे देखे वहाँ से भाग गया।
उस दिन के बाद बंदर ने दूसरों के काम में बेवजह दखल देना छोड़ दिया। अब वह किसी चीज को देखकर तुरंत उसके साथ छेड़छाड़ नहीं करता था। उसे समझ आ गया था कि हर चीज के पीछे कोई न कोई कारण होता है। बिना जाने-समझे उसे बदलने की कोशिश करना नुकसान पहुँचा सकता है।
बंदर और लकड़ी का खूंटा कहानी से सीख
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि बिना सोचे-समझे किसी काम में हाथ नहीं डालना चाहिए। जो चीज हमें बेकार या बेकार की परेशानी लगती है, हो सकता है कि उसका कोई जरूरी काम हो। इसलिए किसी भी चीज के बारे में पूरी जानकारी लिए बिना उसमें छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। दूसरों के काम में बेवजह दखल देने के बजाय पहले समझना और फिर कदम उठाना ही समझदारी है।
